सदियों पहले छोड़ चुका हूँ दामन फिर भी जाने क्यूँ
मेरे चादर से अब तक उस शख़्स की ख़ुशबू आती है
मैं वो शख़्स हूँ जो खुद से ख़फ़ा हूँ लेकिन
है इतनी इल्तेजा तुम कभी नाराज़ मत होना
सच को सच ही कहा जाए तो अच्छा होगा
दर्द कुछ कम ही सहा जाए तो अच्छा होगा
ये हर रोज़ जो किस्तों में मर रहे है हम
इसका रस्ता जो किया जाए तो अच्छा होगा
गुनाह कर के गुनहगार की मैं शफ में तो खड़ा हूँ
अब इससे ज़्यादा आँख का पानी क्या दिखाऊँ