Happy Srivastava 'Ambar'

Happy Srivastava 'Ambar'

@HappySrivastava'Ambar'

Happy Srivastava 'Ambar' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Happy Srivastava 'Ambar''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

इतना कहाँ आसान था चर्बा तेरा हर शख़्स को होना पड़ा क़श्क़ा तेरा मैं चाहता था नाम तेरा कार्ड पर पर अब ग़ज़ल में भर रहा चेहरा तेरा फिर हिज्र को टाला गया कुछ और दिन फिर ज़िद पे भारी पड़ गया गिर्या तेरा जानाँ अभी तो दिल लगा था अस्ल में जानाँ अभी से आ गया पर्चा तेरा हम ने सुनाई जब हमारी दास्ताँ हर शख़्स को दिखने लगा चेहरा तेरा उस ज़ुल्फ़ से उलझे यही है आरज़ू बस मर गया ये सोच के तिश्ना तेरा शाने बदलते जा रहे थे ज़ौक़ में फिर रास्ते में आ गया कूचा तेरा हम ने सुना था आसमाँ पर शख़्स है तो क्यूँ नहीं दिखता उसे गाज़ा तेरा इक तो शराबी और फिर ख़ौफ़-ए-ख़ुदा क्या ख़ूब है ये जन्नती रस्ता तेरा 'अंबर' फ़कत ख़ाली जगह और कुछ नहीं तुझ को कहाँ दिखने लगा कमरा तेरा — Happy Srivastava 'Ambar'
दुल्हन बन कर वो तैयार हुई है मेरी ताज़ी ताज़ी हार हुई है अश़्कों अब बह जाओ तुम थोड़ा सा रस्म-ओ-रुख़सत में दरकार हुई है अपनों ने जब जब खींची ख़ंजर तो हर तलवार फ़क़त बेकार हुई है 'जौन' चलो मस्जिद है हम को जाना मक़्तल है हज़रत पर वार हुई है दुल्हन के जोड़े में देखा उस को दर्द मिरी बिल्कुल हमवार हुई है वो अश्क लिए आँखों में यादों में अब जा कर ज़ेहनी बीमार हुई है क्या उम्दा बातें और अदाकारी थी तू ख़ुद से अच्छी किरदार हुई है आँखें उन पर से हटती तो कैसे बरसों बा'द ये आँखें चार हुई है रोती बोटी रोटी के ख़ातिर, अब वो नीलाम भरे बाज़ार हुई है — Happy Srivastava 'Ambar'

Nazm

“मौन“ इक शख़्स था उलझा हुआ बहका हुआ हर बात में हर हर्फ़ को गढ़ता हुआ इक रोज़ वो शाइ'र ख़मोशी बन गया काग़ज़ क़लम के ख़ून में था सन गया सब दंग थे वो ज़ौक़ में जलता रहा हर दर्द को नग़्में बना कहता रहा कुछ लोग जो उस के जनाज़े पर गए वो कह रहे थे की सुख़न में मर गए पर ये कहानी कुछ अलग सी थी सनम कुछ काग़ज़ों को देख कर बोली क़लम इस मौन की है मौत में असली ख़ता जिस मौन ने हर दर्द को रोके रखा इस में सुख़न के ताब की कैसी ख़ता पीछे पलट पन्ने बताने को हुई कुछ दर्द शाइ'र की दिखाने को हुई छोटे अभी हो चुप रहो पढ़ने चलो इतने बड़े हो कुछ बड़ों जैसे ढलो तुम कुछ नहीं कर पाओगे पीछे हटो ये खेल भी बस का नहीं आगे बढ़ो कुछ रंग पर भी ध्यान दो गोरे बनो देखो फ़ुलाँ के रैंक को कुछ शर्म है मंदिर नहीं जाते कभी कोई धर्म है तानों तले वो दब गया रोने लगा काग़ज़ पर अपने घाव को कहने लगा रोने लगा कहने लगा सुन लो ज़रा सुन लो ज़रा कैसे कोई बच्चा मरा फिर दर्द इक नासूर सा बनने लगा वो काग़ज़ों में मौन को कहने लगा जिस रोज़ 'अंबर' ख़ाक में था रम गया उस रोज़ इक शाइ'र ख़मोशी बन गया — Happy Srivastava 'Ambar'