इशारा है ख़ुदा का एक दूजे के लिए हैं हम
    दुपट्टा तेरा यूँ नईं फँस रहा मेरी घड़ी में जान
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    उसको किसी और से शिकायत हो तो शिकवा भी करे
    बंदा परेशाँ जो अगर ख़ुद से हो तो क्या ही करे
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    वो लोग हम ही थे मुहब्बत में जो फिर आगे हुए
    वो लोग हम ही थे मियाँ जो दूर भागे जिस्म से
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    शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी में गुज़री हमारी
    जिंदगी अब तू मुनासिब सी सज़ा दे गिनती करके
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    मैं समझता था सरल है ज़िन्दगी बस फ़िल्म जितनी
    डर गया मैं ज़िन्दगी की फिर हक़ीक़त को समझ कर

    ऐंठ से आया था बाज़ार-ए-मुहब्बत में कभी जो
    रह गया वो लड़का जानाँ ज़ुल्फ़ में तेरी उलझ कर
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    ऐंठ से आया था बाज़ार-ए-मोहब्बत में कभी जो
    रह गया वो लड़का जानाँ ज़ुल्फ़ में तेरी उलझ कर
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    यार तू भी मानता है हाथ की तहरीर में
    मैं समझता था कि हम दो जिस्म और इक जान है
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    रखा है प्यार हिस्से में परिंदों के
    'शजर' की नौकरी बस चोट खानी है
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    क़ातिल-ए-अमद को क्यूँ दोष दे रहे हो तुम
    मेरे यार उसकी तो शौक-ए-क़त्ल आदत है
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    यार इस तरह मेरे साथ एक दिक्कत है
    दोस्त हूँ उसी का मैं जो मिरी मोहब्ब्त है
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