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जला कर राख कर दी मैं ने फिर तस्वीर लैला की
उसे लगता था उस से ख़ूब-सूरत कोई है ही नइँ
उसे लगता था उस से ख़ूब-सूरत कोई है ही नइँ
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उस को किसी और से शिकायत हो तो शिकवा भी करे
बंदा परेशाँ जो अगर ख़ुद से हो तो क्या ही करे
बंदा परेशाँ जो अगर ख़ुद से हो तो क्या ही करे
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी में गुज़री हमारी
ज़िन्दगी अब तू मुनासिब सी सज़ा दे गिनती कर के
ज़िन्दगी अब तू मुनासिब सी सज़ा दे गिनती कर के
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मैं समझता था सरल है ज़िन्दगी बस फ़िल्म जितनी
डर गया मैं ज़िन्दगी की फिर हक़ीक़त को समझ कर
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यार तू भी मानता है हाथ की तहरीर में
मैं समझता था कि हम दो जिस्म और इक जान है
मैं समझता था कि हम दो जिस्म और इक जान है
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रखा है प्यार हिस्से में परिंदों के
'शजर' की नौकरी बस चोट खानी है
'शजर' की नौकरी बस चोट खानी है
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क़ातिल-ए-अमद को क्यूँ दोष दे रहे हो तुम
मेरे यार उस की तो शौक-ए-क़त्ल आदत है
मेरे यार उस की तो शौक-ए-क़त्ल आदत है
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