Aghaz Barni

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Aghaz Barni shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aghaz Barni's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
बे-हिसी इंसान का हासिल न हो
दोस्ती हो रेत का साहिल न हो

मैं तो बस ये चाहता हूँ वस्ल भी
दो दिलों के दरमियाँ हाएल न हो

मुझ को तन्हा छोड़ने वाले बता
क्या करूँ जब दिल तिरी महफ़िल न हो

किस तरह मेरी ज़बाँ तक आएगा
हर्फ़ जो सच्चाई का हामिल न हो

ये ज़माना चाहता है आज भी
ख़ून-ए-दिल तहरीर में शामिल न हो

जिस तरफ़ ले जा रही है ज़िंदगी
उस तरफ़ भी कूचा-ए-क़ातिल न हो

आदमिय्यत के लिए ये शर्त है
आदमी कुछ हो मगर साइल न हो
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Aghaz Barni
अब अगर इश्क़ के आसार नहीं बदलेंगे
हम भी पैराया-ए-इज़हार नहीं बदलेंगे

रास्ते ख़ुद ही बदल जाएँ तो बदलें वर्ना
चलने वाले कभी रफ़्तार नहीं बदलेंगे

दूर तक है वही आसेब का पहरा अब भी
क्या मिरे शहर के अतवार नहीं बदलेंगे

मैं समझता हूँ सितारे जो सहर से पहले
बुझने वाले हैं शब-ए-तार नहीं बदलेंगे

गुल बदल जाएँगे जब मौसम-ए-गुल बिछड़ेगा
जब ख़िज़ाँ जाएगी तो ख़ार नहीं बदलेंगे

लोग बदलेंगे मफ़ाहीम मुसलसल 'आग़ाज़'
और ये सच है मिरे अशआर नहीं बदलेंगे
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Aghaz Barni
दूर से क्या मुस्कुरा कर देखना
दिल का आलम दिल में आ कर देखना

ख़ुद को गर पहचानना चाहो कभी
मुझ को आईना बना कर देखना

क़द का अंदाज़ा तुम्हें हो जाएगा
अपने साए को घटा कर देखना

मैं अँधेरे ओढ़ कर सो जाऊँगा
तुम उजालों में समा कर देखना

शाम का मंज़र हसीं हो जाएगा
हाथ पे मेहंदी लगा कर देखना

हो चला ज़ख़्म-ए-तमन्ना मुंदमिल
इक ज़रा फिर मुस्कुरा कर देखना

किस क़दर 'आग़ाज़' उबलता है सकूँ
तुम ज़रा आँसू बहा कर देखना
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Aghaz Barni
मैं हर्फ़-ए-इब्तिदा हूँ
मुसलसल इक सदा हूँ

सहर की आरज़ू में
कहाँ तक आ गया हूँ

तख़य्युल हूँ उसी का
मैं जिस का नक़्श-ए-पा हूँ

ज़माना देखता है
मैं जिस को देखता हूँ

मुझे ये होश कब है
बुरा हूँ या भला हूँ

उसे सुलझाऊँ कैसे
मैं ख़ुद उलझा हुआ हूँ
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Aghaz Barni
घर से निकलना जब मिरी तक़दीर हो गया
इक शख़्स मेरे पाँव की ज़ंजीर हो गया

इक हर्फ़ मेरे नाम से दीवार-ए-शहर पर
ये क्या हुआ कि रात में तहरीर हो गया

मैं उस को देखता ही रहा उस में डूब कर
वो था कि मेरे सामने तस्वीर हो गया

वो ख़्वाब जिस पे तीरा-शबी का गुमान था
वो ख़्वाब आफ़्ताब की ताबीर हो गया

मैं तो ज़बाँ पे लाया नहीं तेरा नाम भी
क्यूँ इश्क़ मेरा बाइस-ए-तश्हीर हो गया

'आग़ाज़' उस ने जो भी कहा मेरे वास्ते
वो क्यूँ मिरे कलाम की तफ़्सीर हो गया
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Aghaz Barni
वो नज़र मेहरबाँ अगर होती
ज़िंदगी अपनी मो'तबर होती

नफ़रतों के तवील सहरा में
इन की चाहत तो हम-सफ़र होती

ऐ शब-ए-ग़म मिरे मुक़द्दर की
तेरे दामन में इक सहर होती

लम्हा लम्हा अज़िय्यतें हैं जहाँ
याद ही उन की चारा-गर होती

उन से मंसूब हो गए वर्ना
ज़िंदगी किस तरह बसर होती

हम ही 'आग़ाज़' गर्म-ए-सहरा थे
ज़ुल्फ़ क्या साया-ए-शजर होती
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Aghaz Barni
अगर कुछ ए'तिबार-ए-जिस्म-ओ-जाँ हो
अभी कुछ और मेरा इम्तिहाँ हो

मुझे दरपेश है बस एक मंज़िल
कि तुझ से बात हो लेकिन कहाँ हो

जिसे मौज-ए-बला चूमे मुसलसल
मिरी कश्ती का ऐसा बादबाँ हो

कहाँ तक सूरत-ए-इम्काँ निकालूँ
अगर हर बार मेहनत राएगाँ हो

मिरे ख़्वाबों की वो बे-नाम जन्नत
ज़मीन-ओ-आसमाँ के दरमियाँ हो

मिरे एहसास के आतिश-फ़िशाँ का
अगर हो तो मिरे दिल तक धुआँ हो

अगर 'आग़ाज़' है चुप-चाप साहिल
समुंदर की तरह तुम बे-कराँ हो
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Aghaz Barni
दिल था कि ग़म-ए-जाँ था
मैं ख़ुद से पशेमाँ था

मैं ने उसे चाहा तो
वो मुझ से गुरेज़ाँ था

फ़ितरत के इशारे पर
जो नक़्श था रक़्साँ था

हालात के हाथों में
क्यूँ मेरा गरेबाँ था

कल मेरे तसर्रुफ़ में
इक आलम-ए-इम्काँ था

मैं ख़ुद से छुपा लेकिन
उस शख़्स पे उर्यां था

क्यूँ शहर-ए-निगाराँ में
आग़ाज़ परेशाँ था
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