Ahmad Jahangeer

Ahmad Jahangeer

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Ahmad Jahangeer shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Jahangeer's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
गाथा पढ़ कर आतिश धोंकी गंगा से अश्नान
मैं ने हर युग नज़्र गुज़ारी हर पीढ़ी में दान

ध्यान लगा कर आँखें मूँदीं बैठा घुटने टेक
मीठा लफ़्ज़ भजन बन उतरा सच्चा शे'र गुनान

माँ धरती को पेश-सुख़न के रंग-बिरंगे फूल
भाग भरी को भेंट सुनहरे मिसरे का लोबान

साया सच्चल शाह की अजरक रौशन मीर चराग़
अमरोहे से उठ कर आए हम बाग़-ए-मुल्तान

सय्यारे पर ज़र्दी उतरी दरिया मिट्टी ख़ुश्क
हाथी पर हौदज कसवाओ नाके पर पालान

ऐ धरती के त्यागी उठ कर घोर ख़ला में बैठ
अगली गाड़ी की घंटी तक तू है और रहमान

फ़र्श लपेटे तारे झाड़े नरसंगे की फूँक
पालन-हारा तू दाता है कर जो चाहे ठान

मंज़र आब-ओ-ताब समेटे शायद है मौजूद
लम्स हक़ीक़त अक्स मुजस्सम आवाज़ों पर कान
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Ahmad Jahangeer
ख़ुश्क रोटी तोड़नी है सर्द पानी चाहिए
क्या किसी गिरजे की कुंडी खटख़टानी चाहिए

ऐ समाअ'त उस फ़ज़ा में आज भी मौजूद है
हाँ नवा-ए-नग़्मा-ए-कुन तुझ को आनी चाहिए

काहिना हम से रिवायत का मुकम्मल मत्न सुन
बत्न में जलती हुई शम-ए-मआ'नी चाहिए

साबिक़ा नक़्शे पे ताज़ा सल्तनत ईजाद हो
आसमाँ नीला बनाना घास धानी चाहिए

गुम-शुदा सूरज को रोता है मिरा यौम-ए-सपेद
सुरमई शब को चराग़-ए-आँ-जहानी चाहिए

हुस्न के गारे में आब-ए-इश्क़ की छींटें मिला
चम्पई रंगत में आतिश सनसनानी चाहिए

जिस्म की गोशा-नशीनी और कितने रोज़ है
बंदा-ए-रब्ब-ए-अली को ला-मकानी चाहिए
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Ahmad Jahangeer
ज़ंजीरों से बँधा हुआ हर एक यहूदी तकता था
कोसों दूर से बाबुल का रौशन मीनार चमकता था

ग़ार की रंगीं तस्वीरों को और ज़माने देखेंगे
हम ने बस वो नक़्श किया जो उस लम्हे बन सकता था

इक शफ़्फ़ाफ़ दरीचे में कुछ रंग बिरंगे मंज़र थे
गुल-दानों में फूल फ़रोज़ाँ आतिश-दान भड़कता था

मैं जिस मसनद पर था वो तो इक गोशे में रक्खी थी
और दरीचा चुपके से मंज़र की सम्त सरकता था

बारिश छप्पर तेज़ हवाएँ मिस्री जैसे सिंधी गीत
यार सराए के चूल्हे पर मीठा क़हवा पकता था

जंगल गाँव परिंदे इंसाँ क़िस्से में सब लाखों थे
सय्यारे का सूरज लेकिन तन्हाई में यकता था
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Ahmad Jahangeer
जश्न मनाओ रोने वाले गिर्या भूल के मस्त रहें
सारंगी के तीर समाअ'त में इमशब पैवस्त रहें

ईरानी ग़ालीचे के चौ-गर्द नशिस्तें क़ाएम हों
काफ़ूरी शम्ओं' से रौशन पैहम अहल-ए-हस्त रहें

कसवाया जाए घोड़ों से लकड़ी के पहियों का रथ
तब्ल अलम असवार प्यादे सारे बंदोबस्त रहें

रंग-ए-सपेद-ओ-सियाह सुनहरी सब शक्लों में ज़ाहिर हों
आग से अपनी राख उठा कर सोना चाँदी जस्त रहें

नक़्क़ारे पर चोट मरातिब का एलान सुनाती है
फूस की कुटियाएँ मरमर की दीवारों से पस्त रहें

एक तरफ़ कुछ होंट मोहब्बत की रौशन आयात पढ़ें
इक सफ़ में हथियार सजाए सारे जंग-परस्त रहें
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Ahmad Jahangeer
फ़ीरोज़ी तस्बीह का घेरा हाथ में जल्वा-अफ़्गन था
नारंजी शम्ओं' से हुजरा ख़ैर की शब में रौशन था

राह-रवों ने दश्त-ए-सफ़र में हर उम्मीद सँवारी थी
रंज की राह पे चलने वालों का हर ख़्वाब मुज़य्यन था

रात हुई है ख़ेमा तो नाक़े से उतारा जाएगा
दीप कहाँ रक्खा है जिस में कुछ ज़ैतून का रोग़न था

रंगों की ये क़ाब उलट दे तस्वीरों पर माटी लेप
खोज जो सोने के सिक्कों का इक गोशे में बर्तन था

चीन में सुनते हैं शायद अब आईना ईजाद हुआ
वर्ना इक तालाब ही अपनी आराइश का दर्पन था

मातम की आवाज़ उठाई ज़ंजीरों के हल्क़ों ने
हाथ बंधे थे गर्दन से पर गिर्या शाम-ता-मदयन था
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Ahmad Jahangeer
तू ज़बान-ए-देहली-ओ-लाहौर का पर्वरदिगार
मैं सुकूत-ए-गिलगित-ओ-अस्कर दो-पारा-ए-चनार

बकरियाँ रोज़-ए-अज़ल से कोह की रस्ता शनास
ऐ सुनहरी ज़ीन वाले नुक़रई रथ के सवार

गुलशन-ए-इज़हार के दो ख़ुसरव-ओ-सरमस्त फूल
रंग से रौशन ज़मीन-ए-हिन्द अज़-ता कोहसार

यार हम दो मुख़्तलिफ़ दुनियाओं के तशरीह गर
तू किसी फ़िरक़े का शाइ'र मैं लिसान-ए-किर्दगार

उँगलियों में रौशनी देते ज़मुर्रद के चराग़
मरमरीं बाज़ू का हल्क़ा सुर्ख़ याक़ूती हिसार

रौशनी तारीक रस्ते से ज़मीं तक आ गई
बीज को शौक़-ए-नुमू ने कर दिया है आश्कार
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Ahmad Jahangeer
वज्द करती इक दुआ कच्चे मकानों से उठी
रौशनी तस्बीह के रंगीन दानों से उठी

सुर्ख़ आफ़त से मुज़य्यन तख़्ता-ए-गुल की सहर
शब को नारंजी क़यामत शम्अ-दानों से उठी

सब्ज़ा-ओ-गुल सब अचानक नीलगूँ होने लगे
यक-ब-यक जब ज़र्द माटी आसमानों से उठी

लाद लाने के लिए सरसब्ज़ अंगूरों का रस
हुक्म आते ही मगस छत्ते के ख़ानों से उठी

मैं सुख़न रब-ए-अहद के फ़ज़्ल से करने लगा
इस्तिआरों की चमक मेरे ख़ज़ानों से उठी

घंटियाँ नाक़ूस ताशे सब गुलाब-ए-सुब्ह हैं
पर सहर-ख़ेज़ी की ख़ुशबू बस अज़ानों से उठी
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Ahmad Jahangeer
रुक देख यार खींच ले तस्वीर वक़्त पर
अख़रोट तोड़ती है गिलहरी दरख़्त पर

शायद कहीं से अब्र-ए-करम का ज़ुहूर हो
दरिया पे एक आँख लगा एक दश्त पर

खिड़की में सुब्ह वादी-ए-कैलाश का ज़ुहूर
उतरे अवध की शाम किसी रोज़ तख़्त पर

रथ से हथेलियों पे उतरती अरे ग़ज़ब
मख़मल घसीटती है ज़मीन-ए-करख़्त पर

गुल सुर्ख़ रंग घास हरी नीलगूँ फ़लक
ऐ किर्दगार शुक्र तिरे बंदोबस्त पर

तख़्लीक़ का तिलिस्म कभी देखने चलें
हम आखिरुज़्ज़माँ भी हैं बाब-ए-अलस्त पर
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Ahmad Jahangeer
गेरवे कपड़े बदन पर हाथ लोहे के कड़े
ले मलामत-दार सूफ़ी दर पे तेरे आ पड़े

इख़्तियारात-ए-दयार-ए-दहर हासिल हों मुझे
मेहर से सोना-कशीदों माह से चाँदी झड़े

भेज दे मुझ को जहान-ए-हिसिय्यात-ओ-लम्स में
शोर से उलझे समाअ'त आँख से मंज़र लड़े

सुर्ख़ ईंटों की गली तक जाएँ हम दीवाना-वार
दफ़अ'तन अपनी निगह उस के दरीचे पर पड़े

उस तअ'फ़्फ़ुन-गाह सा इक और सय्यारा भी हो
पेड़ मरते हों जहाँ तालाब में पानी सड़े

हर मसीहा-ए-ज़माँ को ख़ैर-मक़्दम चाहिए
ताज हो काँटों का सर पर मेख़ हाथों में गड़े
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Ahmad Jahangeer
शीराज़ की मय मर्व के याक़ूत सँभाले
मैं कोह-ए-दमावंद से आ पहुँचा हिमालय

होवे तो रहे शीशा-ओ-आहन की हुकूमत
काँसी की मिरी तेग़ है मिट्टी के प्याले

हर शख़्स ब-अंदाज़-ए-दिगर वासिल-ए-शक था
उठा मैं तिरी बज़्म से ईक़ान सँभाले

अब इश्क़-ए-नवर्दी ही ठिकाने से लगाए
शो'ला न जलाए मुझे गिर्दाब उछाले

होने की ख़बर भी न तिरा हिज्र-ज़दा दे
भर लेवे कभी आह कभी शम्अ' जला ले

बोसे का तलज़्ज़ज़ु हो कभी तौफ़ की राहत
अरमान मिरा ये दिल-ए-काफ़िर भी निकाले

इबहाम के रेशों से बना बाग़-ए-तख़य्युल
हो जाए कभी चश्म-ए-तहय्युर के हवाले
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Ahmad Jahangeer
इस से पहले कहीं इम्कान के मीनारे पर
हम मिले होंगे किसी दूसरे सय्यारे पर

यार लबरेज़ निगाहों से ज़ियारत तेरी
रौशनी आए गिरे चश्म के अँधियारे पर

आ तहय्युर के किसी बाग़ उतर जाते हैं
और मिलते हैं कमालात के फ़व्वारे पर

मंज़र-ए-मिस्र में याक़ूब को यूसुफ़ देखे
यूँ रहे आँख तिरे हुस्न के नज़ारे पर

हाथ आ जाए तबस्सुम का तिरे फूल कभी
पाँव पड़ जाए कभी आह के अंगारे पर

शोरिश-ए-सुब्ह दिगर-गूँ में सँभलने के लिए
हाथ रखता हूँ मोहब्बत के गुहर-पारे पर
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Ahmad Jahangeer
ख़ल्क़ से पहले बता दे क्या तिरा मौज़ूअ' है
चित्रकारा सुन यहाँ ताज़ा-कशी ममनूअ' है

फूल नज़्ज़ारे से आगे रौशनी करने की शय
रंग की कारी-गरी में आग भी मजमूअ' है

दश्त में ऐ शह तिरी हरगिज़ अमल-दारी नहीं
ये अज़ा-ख़ाना दयार-ए-हुक्म से मरफ़ूअ' है

ज़ाइचा-साज़ा हमारे ख़्वाब की तक़्तीअ' कर
फ़ाल-गीरा ये बता क्या अब दुआ मसमूअ' है

वहम का सूरज हूँ मेरा क्या तअ'य्युन हो सके
इस तयक़्क़ुन-गाह में मेरी किरन मक़तूअ' है

जल बुझी होगी किसी ढेरी में सरकण्डों की आग
कातिब-ए-मन हौसला रख अब सुख़न मतबूअ' है
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Ahmad Jahangeer
हुक्म दे क़िर्तास पर रंगीं नज़ारा फूँक दूँ
मिसरा-ए-तर में सुनहरा इस्तिआ'रा फूँक दूँ

रम्ज़ की बारा-दरी में ज़ब्त वाजिब गर न हो
मैं तयक़्क़ुन से तअ'ज्जुब का मिनारा फूँक दूँ

मुश्तरी का ताज पहने ज़ुहल पर असवार हूँ
गाह सय्यारा जलाऊँ गाह तारा फूँक दूँ

हाँ इसी दरिया तले आइंदगाँ का शहर है
आतिशीं लब से अगर पानी का धारा फूँक दूँ

एक फ़व्वारे के गेसू एक चौबारे की आँख
चश्म-ए-नज़्ज़ारा जला कर हर इशारा फूँक दूँ

क़ल्ब से उठती हुई शाख़-ए-तमव्वुज हुक्म दे
क्या तनफ़्फ़ुस के शरर से बाग़ सारा फूँक दूँ
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