Akhtar Hashmi

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@akhtar-hashmi

Akhtar Hashmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Hashmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
हम उस से इश्क़ का इज़हार कर के देखते हैं
किया है जुर्म तो इक़रार कर के देखते हैं

है इश्क़ जंग तो फिर जीत लें चलो हम लोग
है दरिया आग का तो पार कर के देखते हैं

है कोहसार तो नहरें निकाल दें इस से
है रेगज़ार तो गुलज़ार कर के देखते हैं

हम उस को देखना चाहें तो किस तरह देखें
सो उस की याद को किरदार कर के देखते हैं

वो होश-मंद अगर है तो कर दें दीवाना
वो बे-ख़बर है तो हुशियार कर के देखते हैं

हमारे सर पे तो आती नहीं कोई दस्तार
सो अपने सर को ही दस्तार कर के देखते हैं
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Akhtar Hashmi
कैसे समझेगा सदफ़ का वो गुहर से रिश्ता
जो समझ पाए न आँखों का नज़र से रिश्ता

मो'तबर सर ही बना लो तो बहुत अच्छा है
कम ही रह पाता है दस्तार का सर से रिश्ता

है ग़रीबों का अमीरों से तअ'ल्लुक़ इतना
जितना होता है चराग़ों का सहर से रिश्ता

बे-असर जब हैं ज़बानें तो किया क्या जाए
वर्ना रखती हैं दुआएँ भी असर से रिश्ता

हम ने रुस्वाई की उस वक़्त से चादर ओढ़ी
जिस घड़ी तोड़ दिया था तिरे दर से रिश्ता

दिल का रिश्ता भी अगर सोचो तो क्या रिश्ता है
निभ रहा है इसी रिश्ते के असर से रिश्ता

जुस्तुजू उस की ख़ुदा जाने है किस मंज़िल तक
ख़त्म होता नहीं 'अख़्तर' का सफ़र से रिश्ता
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Akhtar Hashmi
नज़्म ख़बरों को किया और न लतीफ़े लिक्खे
मैं ने अशआ'र में जीने के सलीक़े लिक्खे

मर्तबे अहल-ए-सुख़न के तुम्हें तय करने हैं
किस ने हक़ बात कही किस ने क़सीदे लिक्खे

सब को तदबीर भी करने को वही कहता है
और हैं सब के मुक़द्दर भी उसी के लिक्खे

शिद्दत-ए-मेहर से दी उस के ग़ज़ब को तश्बीह
उस की रहमत को अगर फ़ज़्ल के साए लिक्खे

कुछ ज़रूर उन में नसीहत थी मगर याद नहीं
जो पढ़े थे वो बुज़ुर्गों के मक़ूले लिक्खे

ज़िंदगी तुझ पे लिखूँगा न ज़ियादा अब कुछ
जो भी मज़मून तिरी मद्ह में लिक्खे लिक्खे

लिखता रहता है वही हर्फ़-ए-तअ'ल्लुक़ 'अख़्तर'
उस से कह दो कि अब इस बात से आगे लिक्खे
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Akhtar Hashmi
मैं तिरे लुत्फ़-ओ-करम का जब से रस पीने लगा
बस तभी से खुल के अपनी ज़िंदगी जीने लगा

ऐ बुलंदी चाहने वाले भटक मत आ उधर
मेरे शानों के सहारे अर्श तक ज़ीने लगा

हो ख़ुशी कोई भी जा कर पड़ गई तेरे गले
ग़म हो कोई भी वो आ कर बस मिरे सीने लगा

हूक कितनी सोज़ कितना टीस कितनी दिल में है
ऐ मता-ए-ज़ख़्म तू अब यूँ न तख़मीने लगा

झुरियाँ चेहरे की 'अख़्तर' ये दिखाएँगे तुझे
उम्र जब ढलने लगे घर में न आईने लगा
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Akhtar Hashmi
ज़िंदगी से पास लेकिन हुस्न के क़िस्से से दूर
हम ग़ज़ल रखते हैं अपनी ज़ुल्फ़ के साए से दूर

हम से जिन को उन्सियत है वो खिंचे आ जाएँगे
उन को क्या नज़दीक लाएँ जो हैं ख़ुद पहले से दूर

जाने कैसे कर्ब उभरे मेरे चेहरे पर कि जो
वो निगाहें अपनी रखते हैं मिरे चेहरे से दूर

एक लम्हा प्यार का जिस को मिले वो सुर्ख़-रू
क्यूँ मुझे रक्खा गया फिर इक इसी लम्हे से दूर

ज़ब्त करना कितना मुश्किल था मुझे मालूम है
ज़िंदगी को फिर भी रक्खा मैं ने हर फ़ित्ने से दूर

ज़ुल्म कर के तू अदालत से अगर बच भी गया
सोच भागेगा कहाँ तक आसमाँ वाले से दूर

आख़िरश अश्कों के चलते ही दुआ पूरी हुई
तुम ने अख़्तर जिन को रक्खा आज तक अपने से दूर
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Akhtar Hashmi