Akhtar Razaa Saleemi

Akhtar Razaa Saleemi

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Akhtar Razaa Saleemi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Razaa Saleemi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
अंदेशे मुझे निगल रहे हैं
क्यूँ दर्द ही फूल-फल रहे हैं

देखो मिरी आँख बुझ रही है
देखो मिरे ख़्वाब जल रहे हैं

इक आग हमारी मुंतज़िर है
इक आग से हम निकल रहे हैं

जिस्मों से निकल रहे हैं साए
और रौशनी को निगल रहे हैं

ये बात भी लिख ले ऐ मुअर्रिख़
मलबे से क़लम निकल रहे हैं
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Akhtar Razaa Saleemi
वो भी क्या दिन थे क्या ज़माने थे
रोज़ इक ख़्वाब देख लेते थे

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती
हम कभी आसमाँ पे रहते थे

आख़िरश ख़ुद तक आन पहुँचे हैं
जो तिरी जुस्तुजू में निकले थे

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और
लोग अपने घरों में सोए थे

हम कहीं दूर थे बहुत ही दूर
और तिरे आस-पास बैठे थे
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Akhtar Razaa Saleemi
तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे
कनार-ए-चश्म कई ख़्वाब सर उठाने लगे

पलक झपकने में गुज़रे किसी फ़लक से हम
किसी गली से गुज़रते हुए ज़माने लगे

मिरा ख़याल था ये सिलसिला दियों तक है
मगर ये लोग मिरे ख़्वाब भी बुझाने लगे

न-जाने रात तिरे मय-कशों को क्या सूझी
सुबू उठाते उठाते फ़लक उठाने लगे

वो घर करे किसी दिल में तो ऐन मुमकिन है
हमारी दर-बदरी भी किसी ठिकाने लगे

मैं गुनगुनाते हुए जा रहा था नाम तिरा
शजर हजर भी मिरे साथ गुनगुनाने लगे

हुदूद-ए-दश्त में आबादियाँ जो होने लगीं
हम अपने शहर में तन्हाइयाँ बसाने लगे

धुआँ धनक हुआ अँगार फूल बनते गए
तुम्हारे हाथ भी क्या मोजज़े दिखाने लगे

'रज़ा' वो रन पड़ा कल शब ब-रज़्म-ए-गाह-ए-जुनूँ
कुलाहें छोड़ के सब लोग सर बचाने लगे
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Akhtar Razaa Saleemi
दिल ओ निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का
तुम्हारा हो के भी मुमकिन है मैं रहूँ उस का

ज़मीं की ख़ाक तो कब की उड़ा चुके हैं हम
हमारी ज़द में है अब चर्ख़-ए-नील-गूँ उस का

तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद
कि तेरा हो तो गया हूँ मगर मैं हूँ उस का

अब उस से क़त-ए-तअल्लुक़ में बेहतरी है मिरी
मैं अपना रह नहीं सकता अगर रहूँ उस का

दिल-ए-तबाह की धड़कन बता रही है 'रज़ा'
यहीं कहीं पे है वो शहर-पुर-सुकूँ उस का
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Akhtar Razaa Saleemi
वो हुस्न-ए-सब्ज़ जो उतरा नहीं है डाली पर
फ़रेफ़्ता है किसी फूल चुनने वाली पर

मैं हल चलाते हुए जिस को सोचा करता था
उसी की गंदुमी रंगत है बाली बाली पर

ये लोग सैर को निकले हैं सो बहुत ख़ुश हैं
मैं दिल-ए-गिरफ़्ता हूँ सब्ज़े की पाएमाली पर

इक और रंग मिला आ के सात रंगों में
शुआ-ए-महर पड़ी जब से तेरी बाली पर

मैं खुल के साँस भी लेता नहीं चमन में 'रज़ा'
मुबादा बार गुज़रता हो सब्ज़ डाली पर
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Akhtar Razaa Saleemi
हमारे जिस्म अगर रौशनी में ढल जाएँ
तसव्वुरात-ए-ज़मान-ओ-मकाँ बदल जाएँ

हमारे बीच हमें ढूँडते फिरें ये लोग
हम अपने-आप से आगे कहीं निकल जाएँ

ये क्या बईद किसी आने वाले लम्हे में
हमारे लफ़्ज़ भी तस्वीर में बदल जाएँ

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर
ये लोग वो नहीं जो ख़्वाब से बहल जाएँ

ये लोग असीर हैं कुछ ऐसी ख़्वाहिशों के 'रज़ा'
जो तितलियों की तरह हाथ से निकल जाएँ
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Akhtar Razaa Saleemi
ख़बर नहीं थी किसी को कहाँ कहाँ कोई है
हर इक तरफ़ से सदा आ रही थी याँ कोई है

यहीं कहीं पे कोई शहर बस रहा था अभी
तलाश कीजिए इस का अगर निशाँ कोई है

जवार-ए-क़रिया-ए-गिर्या से आ रही थी सदा
मुझे यहाँ से निकाले अगर यहाँ कोई है

तलाश कर रहे हैं क़ब्र से छुपाने को
तिरे जहान में हम सा भी बे-अमाँ कोई है

कोई तो है जो दिनों को घुमा रहा है 'रज़ा'
पस-ए-गुमाँ ही सही पर पस-ए-जहाँ कोई है
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Akhtar Razaa Saleemi
बताएँ क्या कि कहाँ पर मकान होते थे
वहाँ नहीं हैं जहाँ पर मकान होते थे

सुना गया है यहाँ शहर बस रहा था कोई
कहा गया है यहाँ पर मकान होते थे

वो जिस जगह से अभी उठ रहा है गर्द-ओ-ग़ुबार
कभी हमारे वहाँ पर मकान होते थे

हर एक सम्त नज़र आ रहे हैं ढेर पे ढेर
हर एक सम्त मकाँ पर मकान होते थे

ठहर सके न 'रज़ा' मौज-ए-तुंद के आगे
वो जिन के आब-ए-रवाँ पर मकान होते थे
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Akhtar Razaa Saleemi
फ़ुरात-ए-चश्म में इक आग सी लगाता हुआ
निकल रहा है कोई अश्क मुस्कुराता हुआ

पस-ए-गुमान कई वाहिमे झपटते हुए
सर-ए-यक़ीन कोई ख़्वाब लहलहाता हुआ

गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं
गुनाह करता हुआ नेकियाँ कमाता हुआ

ब-सू-ए-दश्त-ए-गुमाँ दे रहा है इज़्न-ए-सफ़र
कनार-ए-ख़्वाब सितारा सा झिलमिलाता हुआ
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