Ali Imran

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@ali-imran

Ali Imran shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ali Imran's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
दिल में चलती हुई जंगों से निकल आऊँगा
मैं इन तारीक सुरंगों से निकल आऊँगा

तू भी इक रोज़ तरंगों से निकल जाएगी
मैं भी इन झूटी उमंगों से निकल आऊँगा

आज तू कर ले मुझे क़ैद मुसव्विर मेरे
कल मैं तस्वीर के रंगों से निकल आऊँगा

चाहे दर कितने ही कर बंद मिरी जाँ मुझ पर
मैं तिरे जिस्म के अंगों से निकल आऊँगा
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Ali Imran
तिरे वस्ल पे तेरी क़ुर्बत पे ला'नत
जो तुझ से हुई उस मोहब्बत पे ला'नत

तिरी फूल सी सारी बातों पे थू थू
तिरी भोली-भाली सी सूरत पे ला'नत

हर इक ख़्वाब उम्मीद ख़्वाहिश पे तुफ़ है
हर इक आरज़ू दिल की हसरत पे ला'नत

तुझे दिल की इस नौकरी ने दिया क्या
फ़क़त दर्द जा ऐसी उजरत पे ला'नत
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Ali Imran
शाम घर जाएगी मैं किधर जाऊँगा
आस मर जाएगी मैं किधर जाऊँगा

वो परी एक दिन छोड़ कर जो मुझे
चाँद पर जाएगी मैं किधर जाऊँगा

तू जिधर जाएगी जाऊँगा मैं उधर
तू किधर जाएगी मैं किधर जाऊँगा

ज़िंदगी तेरी तरह गुज़रता हूँ मैं
तू गुज़र जाएगी मैं किधर जाऊँगा

तेरा घर है इधर मेरा घर है खंडर
तो इधर जाएगी मैं किधर जाऊँगा

तेरे वा'दे पे सब छोड़ आया हूँ मैं
तू मुकर जाएगी मैं किधर जाऊँगा

एक दिन ये तबीअ'त मिरी जान-ए-जाँ
तुझ से भर जाएगी मैं किधर जाऊँगा
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Ali Imran
अब कोई ग़म ही नहीं है जो रुलाए मुझ को
ऐसा मौसम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

ज़ख़्म में दर्द नहीं है जो उठाए टीसें
आँख में नम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

चाँद नाराज़ नहीं है न सितारे हैं ख़फ़ा
रात बरहम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

मुझ में सब कुछ ही मुकम्मल है तो किस बात का दुख
कुछ कहीं कम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

तेरे होंटों से मिरे ज़ख़्म चहक उट्ठेंगे
ये वो मरहम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

ऐ मिरे ख़्वाब तू टूटे मैं नहीं टूटूँगा
तुझ में वो दम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

तेरे जाने पे भी अफ़्सुर्दा नहीं है कोई
तेरा मातम ही नहीं है जो रुलाए मुझ को
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Ali Imran
मैं कब से मरा अपने अंदर पड़ा हूँ
मैं मुर्दा हूँ मुर्दे के ऊपर पड़ा हूँ

मैं दुनिया बदलने को निकला था घर से
सो थक हार के घर में आ कर पड़ा हूँ

ख़ुदा हूँ मैं गुम्बद से लटका हुआ हूँ
मैं भगवान मंदिर के बाहर पड़ा हूँ

तिरे पाँव की धूल ही चाटनी है
तिरे दर का बन के मैं पत्थर पड़ा हूँ

क़दम धर मिरी सूखी इस सर-ज़मीं पे
तिरी चाह में कब से बंजर पड़ा हूँ

सवेरा हुआ मक्खियाँ आ गई हैं
मैं जागा हुआ छत पे क्यूँ कर पड़ा हूँ
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Ali Imran
पूछते हो तुम मैं कब कर के दिखलाऊँगा
जादूगर हूँ कर्तब कर के दिखलाऊँगा

तुझ को लगता है मैं प्यार से बेगाना हूँ
हैराँ होगी जब जब कर के दिखलाऊँगा

चाँद बुझेगा तारे पिघलेंगे रातों के
देखेगी तू मैं सब कर के दिखलाऊँगा

प्यास बनूँगा यार मैं तेरे होंटों की
ज़ख़्मी मैं तेरे लब कर के दिखलाऊँगा
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Ali Imran
इतनी बार मोहब्बत करना कितना मुश्किल हो जाता है
इंसानों पे हिजरत करना कितना मुश्किल हो जाता है

शब भर तारों को गिनने में कितनी दुश्वारी है यार
जागते रहना आदत करना कितना मुश्किल हो जाता है

मेरे अंदर की सब रातें साए जितनी रहती हैं
तारीकी से सोहबत करना कितना मुश्किल हो जाता है

कितना मुश्किल हो जाता है करना और न करना सब
ये करना तुम ये मत करना कितना मुश्किल हो जाता है

तुझ को छूने की ख़्वाहिश में पल पल जलता रहता हूँ
तेरे जिस्म की हसरत करना कितना मुश्किल हो जाता है
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Ali Imran
बारिश के घनघोर हवाले गिनता रहता हूँ
लम्हा लम्हा बादल काले गिनता रहता हूँ

सदियाँ गुज़रीं ख़्वाबों को आँखों में आए
पलकों पर मकड़ी के जाले गिनता रहता हूँ

ऊपर वाला मंज़िल मुझ को दिखलाता है
और मैं अपने पैर के छाले गिनता रहता हूँ

तारीकी की लाशें गिनना कितना मुश्किल है
दिन के आदम-ख़ोर उजाले गिनता रहता हूँ

मेरी छाँव के टुकड़े खाता जाता है सूरज
मैं आँगन में बैठ निवाले गिनता रहता हूँ

पानी कितना ऊपर हो तो डूबूँगा मैं
कितने पत्थर अब तक डाले गिनता रहता हूँ

दुनिया तारे गिनते गिनते सोती है यार
मैं बे-चारा चाँद के हाले गिनता रहता हूँ
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Ali Imran
नीम के उस पेड़ से उतरा है जिन
फिर किसी के ख़ून का प्यासा है जिन

घर में जितने लोग थे वो खा गया
मैं बचा हूँ पर अभी भूका है जिन

फूँकता हूँ पढ़ के सारी आयतें
और मुझ को देख के हँसता है जिन

कूदता है रात भर वो सहन में
हर जगह घर में मिरे फिरता है जिन

रात डाइन है मचाँ से झूलती
और इस के साथ ही लटका है जिन

घर की इक दीवार में सूराख़ था
हाँ इसी सूराख़ से निकला है जिन

देख लेना अब नहीं छोड़ेगा वो
अब मिरे सीने पे चढ़ बैठा है जिन
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Ali Imran