Ali Kazim

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@ali-kazim

Ali Kazim shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ali Kazim's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
कुछ झूटे कुछ सच्चे लोग
देखो रंग-बिरंगे लोग

मोम के जैसा नाज़ुक दिल
लम्बे चौड़े तगड़े लोग

तेरी बातें तेरा ज़िक्र
मेरी महफ़िल तेरे लोग

सूनी सूनी राहें हैं
कैसे निकलें घर से लोग

तेरी गली में मिलते हैं
जाने कैसे कैसे लोग

सूरज निकला रोज़ 'अली'
आँख खुली जब जागे लोग
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Ali Kazim
लोग आएँगे लोग जाएँगे
नक़्श ही नक़्श को मिटाएँगे

फूल काग़ज़ के भी महकते हैं
तेरे छूने पे ये दिखाएँगे

और हो जाएगा ये दिल तन्हा
इस को जिस के क़रीब लाएँगे

चाँद कोई छुपा नहीं सकता
वो नज़र हर क़बा में आएँगे

ये तो ठंडी हवा के झोंके हैं
और हम को क़रीब लाएँगे
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Ali Kazim
वीरान था दिल आज भी वीराना वही है
ये दौर नया है मगर अफ़्साना वही है

तू पालकी में बैठ के गुम हो गया लेकिन
गलियों से तिरी आज भी याराना वही है

हम भी नहीं बदले ये जहाँ भी नहीं बदला
हर रोज़ हर इक बात पे टकराना वही है

अब तक वही है हुस्न का पल पल में बदलना
अब तक तिरे दीवानों का घबराना वही है

गुज़रे थे तिरे साथ कभी राह-ए-चमन से
ये सोच कर इस राह में इतराना वही है

जो क़ैस को दुनिया से 'अली' संग मिले थे
है रस्म वही इश्क़ की नज़राना वही है
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Ali Kazim
दुनिया बदल भी सकती है कोशिश तो यार कर
ख़ुद पर तो ए'तिबार ज़रा एक बार कर

दिल दे रहा था उस को तभी होश ने कहा
इतनी हसीन चीज़ का मत कारोबार कर

झूटा अगर हो यार तो हर वा'दा तोड़ दे
सच्चा लगे तो जान भी उस पर निसार कर

अब तक तिरे हिजाब से थी बे-क़रारियाँ
अब बे-हिजाब हो के ज़रा बे-क़रार कर

मैं आम आदमी हूँ नहीं पीर औलिया
मेरी हर एक बात पे मत ए'तिबार कर

दुनिया ने ऐसा ज़ख़्म दिया भर सका न जो
दुनिया को अपना ज़ख़्म दिखा शर्मसार कर
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Ali Kazim
तुम जा रहे हो हम को भुलाने के वास्ते
हम आ रहे हैं तुम को मनाने के वास्ते

पत्थर के पास दिल कहाँ जिस को बुरा लगे
क्यों इतना सोचते हो हटाने के वास्ते

कुछ साज़िशें तो सिर्फ़ इसी वजह से हुईं
अपने को साज़िशों से बचाने के वास्ते

मुझ को भुला के वो भी कई बार रोए हैं
लेकिन वफ़ा का ढोंग रचाने के वास्ते

कोई नहीं है बज़्म में जो तुम को पूछ ले
लगता है मर गए हो ज़माने के वास्ते
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Ali Kazim
तन्हाई तुम्हारी भी ज़रूरत तो नहीं है
तुम को भी कहीं दर्द-ए-मोहब्बत तो नहीं है

मुँह फेर लिया तुम ने हमें देखने के बाद
ये चीज़ तुम्हारी कहीं आदत तो नहीं है

वो माँगते हैं आज गुनाहों की मुआ'फ़ी
या-रब बता दे आज क़यामत तो नहीं है

मैं चाहता हूँ चाँद तुम्हें कह के पुकारूँ
फिर सोचता हूँ कोई हिमाक़त तो नहीं है

दौलत मिली तो ठीक से मिलने लगे हैं लोग
इंसान की पहचान ये दौलत तो नहीं है
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Ali Kazim