Ambareen Haseeb ambar

Ambareen Haseeb ambar

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Ambareen Haseeb ambar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ambareen Haseeb ambar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
मिला भी ज़ीस्त में क्या रन्ज-ए-रह-गुज़ार से कम
सो अपना शौक़-ए-सफ़र भी नहीं ग़ुबार से कम

तिरे फ़िराक़ में दिल का अजीब आलम है
न कुछ ख़ुमार से बढ़ कर न कुछ ख़ुमार से कम

हँसी-ख़ुशी की रफ़ाक़त किसी से क्या चाहें
यहाँ तो मिलता नहीं कोई ग़म-गुसार से कम

वो मुंतज़िर है यक़ीनन हवा-ए-सरसर का
जो हब्स हो न सका बाद-ए-नौ-बहार से कम

बुलंदियों के सफ़र में क़दम ज़मीं पे रहें
ये तख़्त-ओ-ताज भी होते नहीं हैं दार से कम

अजीब रंगों से मुझ को सँवार देती है
कि वो निगाह-ए-सताइश नहीं सिंघार से कम

मिरी अना ही सदा दरमियाँ रही हाएल
वगर्ना कुछ भी नहीं मेरे इख़्तियार से कम

वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा
मुझे वो जीत भी 'अम्बर' न होगी हार से कम
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Ambareen Haseeb ambar
सितारा-बार बन जाए नज़र ऐसा नहीं होता
हर इक उम्मीद बर आए मगर ऐसा नहीं होता

मोहब्बत और क़ुर्बानी में ही ता'मीर मुज़्मर है
दर-ओ-दीवार से बन जाए घर ऐसा नहीं होता

सभी के हाथ में मिस्ल-ए-सिफ़ाल-ए-नम नहीं रहना
जो मिल जाए वही हो कूज़ा-गर ऐसा नहीं होता

कहा जलता हुआ घर देख कर अहल-ए-तमाशा ने
धुआँ ऐसे नहीं उठता शरर ऐसा नहीं होता

किसी की मेहरबाँ दस्तक ने ज़िंदा कर दिया मुझ को
मैं पत्थर हो गई होती अगर ऐसा नहीं होता

किसी जज़्बे की शिद्दत मुनहसिर तकमील पर भी थी
न पाया हो तो खोने का भी डर ऐसा नहीं होता
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Ambareen Haseeb ambar
ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया
वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया

है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय
सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया

मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली
समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया

ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर
की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया

समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर
नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया

अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में
सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया
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Ambareen Haseeb ambar
शब थी बे-ख़्वाब इक आरज़ू देर तक
शहर-ए-दिल में फिरी कू-ब-कू देर तक

चाँदनी से तसव्वुर का दर वा हुआ
तुम से होती रही गुफ़्तुगू देर तक

जाग उट्ठे थे क़ुर्बत के मौसम तमाम
फिर सजी महफ़िल-ए-रंग-ओ-बू देर तक

दफ़अ'तन उठ गई हैं निगाहें मिरी
आज बैठे रहो रू-ब-रू देर तक

तुम ने किस कैफ़ियत में मुख़ातब किया
कैफ़ देता रहा लफ़्ज़-ए-'तू' देर तक

दिल के सादा उफ़ुक़ पर तुम्ही से रहे
रंग-ए-क़ौस-ओ-क़ुज़ह चार-सू देर तक

रत-जगे में रहा ख़्वाब का वो समाँ
कैफ़ियत थी वही हू-ब-हू देर तक
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Ambareen Haseeb ambar
जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का
रोज़ बढ़ जाता है इक हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का

मेरे हिस्से में कहाँ थीं उजलतों की मंज़िलें
मेरे क़दमों को सदा रस्ता मिला ताख़ीर से

किस लिए बर्बादियों का दिल को है इतना मलाल
और क्या अंदाज़ा हो ख़म्याज़ा-ए-ता'मीर का

ख़ून-ए-दिल जिन की गवाही में हुआ नज़्र-ए-वफ़ा
रंग तो वो उड़ गए अब क्या करूँ तस्वीर का

मैं ने समझा तेरी चाहत को फ़क़त इनआ'म-ए-ज़ीस्त
मुझ को अंदाज़ा न था इस जुर्म इस ता'ज़ीर का

एक लब तक ही न पहुँची जो दुआ थी मुस्तजाब
किस क़दर चर्चा हुआ है आह-ए-बे-तासीर का

लफ़्ज़ की हुरमत मुक़द्दम है दिल-ओ-जाँ से मुझे
सच तआ'रुफ़ है मिरे हर शे'र हर तहरीर का
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Ambareen Haseeb ambar
इक गली से ख़ुश्बू की रस्म-ओ-राह काफ़ी है
लाख जब्र मौसम हो ये पनाह काफ़ी है

निय्यत-ए-ज़ुलेख़ा की खोज में रहे दुनिया
अपनी बे-गुनाही को दिल गवाह काफ़ी है

उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है

आसमाँ पे जा बैठे ये ख़बर नहीं तुम को
अर्श के हिलाने को एक गुनाह काफ़ी है

पैरवी से मुमकिन है कब रसाई मंज़िल तक
नक़्श-ए-पा मिटाने को गर्द-ए-राह काफ़ी है

चार दिन की हस्ती में हँस के जी लिए 'अम्बर'
बे-नशात दुनिया से ये निबाह काफ़ी है
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Ambareen Haseeb ambar
जिस्म-ओ-जाँ में दर आई इस क़दर अज़िय्यत क्यूँ
ज़िंदगी भला तुझ से हो रही है वहशत क्यूँ

सिलसिला मोहब्बत का सिर्फ़ ख़्वाब ही रहता
अपने दरमियाँ आख़िर आ गई हक़ीक़त क्यूँ

फ़ैसला बिछड़ने का कर लिया है जब तुम ने
फिर मिरी तमन्ना क्या फिर मिरी इजाज़त क्यूँ

ये अजीब उलझन है किस से पूछने जाएँ
आइने में रहती है सिर्फ़ एक सूरत क्यूँ

कर्र-ओ-फ़र्र से निकले थे जो समेटने दुनिया
भर के अपने दामन में आ गए नदामत क्यूँ

आप से मुख़ातिब हूँ आप ही के लहजे में
फिर ये बरहमी कैसी और ये शिकायत क्यूँ
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Ambareen Haseeb ambar
चराग़ घर में जला नहीं है
ये रात का मसअला नहीं है

ये रात तुम से नहीं कटेगी
ये हिज्र है रत-जगा नहीं है

दलील मंतिक़ नहीं चलेगी
ये इश्क़ है फ़ल्सफ़ा नहीं है

ये इश्क़ है बंदगी समझ मत
तू आदमी है ख़ुदा नहीं है

है रंज क्यों हाल-ए-दिल पे आख़िर
ये क़िस्सा तू ने सुना नहीं है

ख़ुद अपने दुश्मन हैं लोग सारे
नहीं कोई दूसरा नहीं है

हवा से लौ थरथरा गई थी
चराग़ लेकिन बुझा नहीं है
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Ambareen Haseeb ambar
कब मौसम-ए-बहार पुकारा नहीं किया
हम ने तिरे बग़ैर गवारा नहीं किया

दुनिया तो हम से हाथ मिलाने को आई थी
हम ने ही ए'तिबार दोबारा नहीं किया

मिल जाए ख़ाक में न कहीं इस ख़याल से
आँखों ने कोई इश्क़ सितारा नहीं किया

इक उम्र के अज़ाब का हासिल वहीं बहिश्त
दो चार दिन जहाँ पे गुज़ारा नहीं किया

ऐ आसमाँ किस लिए इस दर्जा बरहमी
हम ने तो तिरी सम्त इशारा नहीं किया

अब हँस के तेरे नाज़ उठाएँ तो किस लिए
तू ने भी तो लिहाज़ हमारा नहीं किया
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Ambareen Haseeb ambar
दिल जिन को ढूँढता है न-जाने कहाँ गए
ख़्वाब-ओ-ख़याल से वो ज़माने कहाँ गए

मानूस बाम-ओ-दर से नज़र पूछती रही
उन में बसे वो लोग पुराने कहाँ गए

उस सरज़मीं से थी जो मोहब्बत वो क्या हुई
बच्चों के लब पे थे जो तराने कहाँ गए

अपनी ख़ता पे सर को झुकाया है आज क्यूँ
अज़बर जो आप को थे बहाने कहाँ गए

पत्थर समाअ'तों से ज़बाँ गुंग हो गई
हम भी गए तो हाल सुनाने कहाँ गए

बे-महरी-ए-हयात तुझे कुछ ख़बर भी है
देखे गए जो ख़्वाब सुहाने कहाँ गए

बचपन सहेलियाँ वो हमा-वक़्त की हँसी
'अम्बर' वो ज़िंदगी के ख़ज़ाने कहाँ गए
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Ambareen Haseeb ambar
अयाँ दोनों से तक्मील-ए-जहाँ है
ज़मीं गुम हो तो फिर क्या आसमाँ है

तिलस्माती कोई क़िस्सा है दुनिया
यहाँ हर दिन नई इक दास्ताँ है

जो तुम हो तो ये कैसे मान लूँ मैं
कि जो कुछ है यहाँ बस इक गुमाँ है

सरों पर आसमाँ होते हुए भी
जिसे देखो वही बे-साएबाँ है

किसी धरती की शायद रेत होगी
हमारे वास्ते जो कहकशाँ है

अगर था चंद-रोज़ा मौसम-ए-गुल
तो फिर दो चार ही दिन की ख़िज़ाँ है

जिसे उम्र-ए-रवाँ कहते हैं 'अम्बर'
चलो देखें कहाँ तक राएगाँ है
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Ambareen Haseeb ambar
अब असीरी की ये तदबीर हुई जाती है
एक ख़ुश्बू मिरी ज़ंजीर हुई जाती है

इक हसीं ख़्वाब कि आँखों से निकलता ही नहीं
एक वहशत है कि ता'बीर हुई जाती है

उस की पोशाक निगाहों का अजब है ये फ़ुसूँ
ख़ुश-बयानी मिरी तस्वीर हुई जाती है

अब वो दीदार मयस्सर है न क़ुर्बत न सुख़न
इक जुदाई है जो तक़दीर हुई जाती है

उन को अशआ'र न समझें कहीं दुनिया वाले
ये तो हसरत है जो तहरीर हुई जाती है
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Ambareen Haseeb ambar
ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना

दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना

हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना

इश्क़ ने यूँ दोनों को आमेज़ किया
अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना

ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं
आईने में तुम होते हो तुम भी ना

बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो
अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना

मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो
मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना

माँग रहे हो रुख़्सत और ख़ुद ही अब
हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना
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Ambareen Haseeb ambar
ऐ ख़ुदा अजब है तिरा जहाँ मिरा दिल यहाँ पे लगा नहीं
जहाँ कोई अहल-ए-वफ़ा नहीं किसी लब पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं

बड़ा शोर था तिरे शहर का सो गुज़ार आए हैं दिन वहाँ
वो सकूँ कि जिस की तलाश है तिरे शहर में भी मिला नहीं

ये जो हश्र बरपा है हर तरफ़ तो बस इस का है यही इक सबब
है लबों पे नाम-ए-ख़ुदा मगर किसी दिल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा नहीं

जो हँसी है लब पे सजी हुई तो ये सिर्फ़ ज़ब्त का फ़र्क़ है
मिरे दिल में भी वही ज़ख़्म हैं मिरा हाल तुझ से जुदा नहीं

ये जो दश्त-ए-दिल में हैं रौनक़ें ये तिरी अता के तुफ़ैल हैं
दिया ज़ख़्म जो वो हरा रहा जो दिया जला वो बुझा नहीं

ऐ ख़ुदा अजब है तिरी रज़ा कोई भेद इस का न पा सका
कि मिला तो मिल गया बे-तलब जिसे माँगते थे मिला नहीं

वो जो हर्फ़-ए-हक़ था लिखा गया किसी शाम ख़ून से रेत पर
है गवाह मौजा-ए-वक़्त भी कि वो हर्फ़ उस से मिटा नहीं
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Ambareen Haseeb ambar
मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से
जो मुझे भूल गया इस क़दर आसानी से

ख़ुद से घबरा के यही कहती हूँ औरों की तरह
ख़ौफ़ आता है मुझे शहर की वीरानी से

अब किसी और सलीक़े से सताए दुनिया
जी बदलने लगा असबाब-ए-परेशानी से

तन को ढाँपे हुए फिरते हैं सभी लोग यहाँ
शर्म आती है किसे सोच की उर्यानी से

ऐ फ़लक छोड़ दे बेयार-ओ-मददगार हमें
दम घुटा जाता है अब तेरी निगहबानी से

मैं उसे ख़्वाब समझ सकती हूँ लेकिन 'अम्बर'
लम्स जाता नहीं उस का मिरी पेशानी से
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Ambareen Haseeb ambar
इस आरज़ी दुनिया में हर बात अधूरी है
हर जीत है ला-हासिल हर मात अधूरी है

कुछ देर की रिम-झिम को मा'लूम नहीं शायद
जल-थल न हो आँगन तो बरसात अधूरी है

क्या ख़ूब तमाशा है ये कार-गह-ए-हस्ती
हर जिस्म सलामत है हर ज़ात अधूरी है

महरूम-ए-तमाज़त दिन शब में भी नहीं ख़ुनकी
ये कैसा तअ'ल्लुक़ है हर बात अधूरी है
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Ambareen Haseeb ambar
बहते हुए अश्कों की रवानी नहीं लिक्खी
मैं ने ग़म-ए-हिज्राँ की कहानी नहीं लिक्खी

जिस दिन से तिरे हाथ से छूटा है मिरा हाथ
उस दिन से कोई शाम सुहानी नहीं लिक्खी

क्या जानिए क्या सोच के अफ़्सुर्दा हुआ दिल
मैं ने तो कोई बात पुरानी नहीं लिक्खी

अल्फ़ाज़ से काग़ज़ पे सजाई है जो दुनिया
जुज़ अपने कोई चीज़ भी फ़ानी नहीं लिक्खी

तश्हीर तो मक़्सूद नहीं क़िस्सा-ए-दिल की
सो तुझ को लिखा तेरी निशानी नहीं लिक्खी
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Ambareen Haseeb ambar
ज़मीं पे इंसाँ ख़ुदा बना था वबा से पहले
वो ख़ुद को सब कुछ समझ रहा था वबा से पहले

पलक झपकते ही सारा मंज़र बदल गया है
यहाँ तो मेला लगा हुआ था वबा से पहले

तुम आज हाथों से दूरियाँ नापते हो सोचो
दिलों में किस दर्जा फ़ासला था वबा से पहले

अजीब सी दौड़ में सब ऐसे लगे हुए थे
मकाँ मकीनों को ढूँढता था वबा से पहले

हम आज ख़ल्वत में इस ज़माने को रो रहे हैं
वो जिस से सब को बहुत गिला था वबा से पहले

न जाने क्यों आ गया दुआ में मिरी वो बच्चा
सड़क पे जो फूल बेचता था वबा से पहले

दुआ को उट्ठे हैं हाथ 'अम्बर' तो ध्यान आया
ये आसमाँ सुर्ख़ हो चुका था वबा से पहले
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Ambareen Haseeb ambar
ये शो'ले आज़माना जानते हैं
सो हम दामन बचाना जानते हैं

तअ'ल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना
कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं

खनकती नुक़रई दिलकश हँसी में
हम अपना ग़म छुपाना जानते हैं

बुलाना ही नहीं पड़ता है 'अम्बर'
ये ग़म अपना ठिकाना जानते हैं
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Ambareen Haseeb ambar
हो गई बात पुरानी फिर भी
याद है मुझ को ज़बानी फिर भी

मौजा-ए-ग़म ने तो दम तोड़ दिया
रह गया आँख में पानी फिर भी

मैं ने सोचा भी नहीं था इस को
हो गई शाम सुहानी फिर भी

चश्म-ए-नम ने उसे जाते देखा
दिल ने ये बात न मानी फिर भी

लोग अर्ज़ां हुए जाते हैं यहाँ
बढ़ती जाती है गिरानी फिर भी

बुरीदा लाए हो दरबार में तुम
याद है शो'ला-बयानी फिर भी

भूल जोते हैं मुसाफ़िर रस्ता
लोग कहते हैं कहानी फिर भी
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Ambareen Haseeb ambar

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