किसी भी शख़्स के झूठे दिलासे में नहीं आती
कहानी हो अगर लंबी तराशे में नहीं आती
जहाँ में अब कहाँ कोई जो मजनूँ की तरह चाहे
मोहब्बत इसलिए भी अब तमाशे में नहीं आती
तेरी कश्ती रवानी में वो आनी भी नहीं देंगे
तुझे पहचान अपनी ही बनानी भी नहीं देंगे
वफ़ादारी लुटाई तूने कुछ ऐसे ही लोगों पर
जो तुझको ही तिरे हिस्से का पानी भी नहीं देंगे
समुंदर पार करना है तभी कश्ती पे बैठा हूँ
किनारे पर पहुँचना है अभी लहरों से लड़ना है
ये जो मज़लूम लोगों की सदा जिनको नहीं आती
मुझे मज़लूम की ख़ातिर ही उन बहरों से लड़ना है
भँवर में जब कभी भी सामना मझदार का होना
ज़रूरी भी है कश्ती के लिए पतवार का होना,
वतन की नीव हैं हम तो अलग हो ही नहीं सकते
कभी देखा है ख़बरों के बिना अख़बार का होना
परिन्दों खुल के उड़ना है परिन्दों खुल के जीना है
परिन्दों अब किसी सय्याद के झाँसे में मत आना
जहाँ क़ातिल भी मिलते हों जहाँ बिकते हो मुंसिफ़ भी
वहाँ मुश्किल सा हो जाता है हक़ में फ़ैसला होना
जहाँ हर शाम पंछी को शजर ही याद आता है
मैं दफ़्तर से निकलता हूँ तो घर ही याद आता है
वो जब रास्ता किसी का देखता होगा
मेरे बारे में कुछ तो सोचता होगा
मन उसका कहता होगा बात करने को
फिर मुश्किल से वो ख़ुद को रोकता होगा