Balbir Rathi

Balbir Rathi

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Balbir Rathi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Balbir Rathi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
ख़ोल सा ओढ़े हुए लगते हैं लोग
बात क्या है इतने चुप कैसे हैं लोग

बंद कमरों से अभी निकले हैं लोग
और ही अंदाज़ से मिलते हैं लोग

जिस को देखो है वही झुलसा हुआ
किस दहकती आग से निकले हैं लोग

कौन किसी की फ़िक्र करता है यहाँ
अपने अपने जाल में उलझे हैं लोग

रौशनी की क्यूँ नहीं करते तलाश
क्यूँ अँधेरा बाँटते फिरते हैं लोग

मंज़िलों का ज़िक्र ही बे-सूद है
गुमरही से मुतमइन लगते हैं लोग

ज़हर पीते हैं मगर मरते नहीं
कुछ न पूछो कैसे क्या करते हैं लोग
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Balbir Rathi
राह में यूँ तो मरहले हैं बहुत
हम-सफ़र फिर भी आ गए हैं बहुत

ये अलग बात हम न ढूँढ सके
वर्ना मंज़िल के रास्ते हैं बहुत

जिन को मंज़िल न रास्ते का पता
ऐसे रहबर हमें मिले हैं बहुत

आओ सूरज को छीन कर लाएँ
ये अँधेरे तो बढ़ गए हैं बहुत

दूर की मंज़िलें हैं नज़रों में
अब के यारों के हौसले हैं बहुत

इक जुनूँ का जो दौर था मुझ पर
उस के क़िस्से ही बन गए हैं बहुत

बात क्या है कि इन दिनों हम लोग
सोचते कम हैं बोलते हैं बहुत
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Balbir Rathi
चाहा जिन को भी ज़िंदगी की तरह
वो मिले मुझ को अजनबी की तरह

मुझ को इल्हाम हो गया शायद
बात करता हूँ इक नबी की तरह

जाने कितने सवाल उभरे हैं
जब भी सोचा है फ़लसफ़ी की तरह

सारा मंज़र निखरता जाता है
कौन हँसता है आप ही की तरह

ख़ूब चर्चा है गो सवेरों का
रात फिर भी है रात ही की तरह

वक़्त की बात है कि अब तुम भी
हम से मिलते हो अजनबी की तरह

ये दरिंदों का शहर है इस में
कौन मिलता है आदमी की तरह
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Balbir Rathi
ज़र्रा ज़र्रा पिघलने वाला था
सारा मंज़र बदलने वाला था

सब्र हम से न हो सका वर्ना
अपनी ज़िद से वो टलने वाला था

ज़ब्त करते तो एक इक ज़र्रा
राज़ अपना उगलने वाला था

तुम अँधेरों से डर गए यूँ ही
वर्ना सूरज निकलने वाला था

तुम ने अच्छा किया जो थाम लिया
वर्ना मैं कब सँभलने वाला था

जो रहा इक हरीफ़ की मानिंद
वो मिरे साथ चलने वाला था

ज़ेहन में वो जो अक्स था कब से
लाख शक्लों में ढलने वाला था
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Balbir Rathi
ऐसे गुम-सुम वो सोचते क्या थे
जाने यारों के फ़ैसले क्या थे

हम तो यूँ ही रुके रहे वर्ना
अपने आगे वो फ़ासले क्या थे

बोझ दिल का उतारना था ज़रा
वर्ना तुम से हमें गिले क्या थे

सहरा सहरा लिए फिरे हम को
वो जुनूँ के भी सिलसिले क्या थे

दूर तक थी न गर कोई मंज़िल
फिर वो उजले निशान से क्या थे

हम ही थे जो यक़ीन कर बैठे
वर्ना उन के वो मो'जिज़े क्या थे

सर-फिरे थे कि मस्ख़रे यारो
जो हमें यूँ लिए फिरे क्या थे
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Balbir Rathi
कोई मंज़िल भी नहीं है कोई रस्ता भी नहीं
और सब महव-ए-सफ़र हैं कोई रुकता भी नहीं

हर तरफ़ बे-रंग सी गहरी उदासी का जमाव
एक रंगीं ख़्वाब जो नज़रों से हटता भी नहीं

किस तरह थामे हुए हैं ख़ुद को उस बस्ती के लोग
कोई मुतवाज़िन नहीं है और फिसलता भी नहीं

इक मुसलसल सी ये सई-ए-राइगाँ ये काविशें
एक पत्थर सा ये मंज़र जो पिघलता भी नहीं

बे-सबब सी टीस दिल में मुस्तक़िल होती हुई
जज़्बा-ए-बेबाक जो दिल में उतरता भी नहीं

हर तरफ़ ये धूप हर-दम तेज़-तर होती हुई
मोम का इक शहर लेकिन जो पिघलता भी नहीं
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Balbir Rathi
शहर बदला हुआ सा लगता है
हर कोई ऊपरा सा लगता है

मुझ को अक्सर ख़ुद अपने अंदर ही
कुछ भटकता हुआ सा लगता है

जाने क्या बात है कि घर मुझ को
रोज़ गिरता हुआ सा लगता है

मुझ को हर शख़्स अपनी बस्ती का
ख़ुद से रूठा हुआ सा लगता है

दर्द से यूँ नजात कब होगी
वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है

ज़ख़्म खाए हुए ज़माना हुआ
दर्द अब तक नया सा लगता है

दास्तानें हैं ख़ूब सब की मगर
अपना क़िस्सा जुदा सा लगता है
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Balbir Rathi
फिर फ़ज़ा में कोई ज़हरीला धुआँ भर जाएगा
फिर किसी दिन अपने अंदर कुछ न कुछ मर जाएगा

फैलता जाता है ये जो हर-तरफ़ इक शोर सा
एक सन्नाटा किसी दहलीज़ पर धर जाएगा

यूँ रहा तो सारे मंज़र बद-नुमा हो जाएँगे
इक भयानक रंग हर तस्वीर में भर जाएगा

कर रहा है अपनी बस्ती में जो ख़ुशियों की तलाश
कोई तीखा दर्द अपने साथ ले कर जाएगा

यूँ अचानक भी हुआ करता है कोई हादिसा
मुझ को क्या मा'लूम था वो इस तरह मर जाएगा

छा गई नफ़रत की गहरी धुँद इतनी दूर तक
प्यार का सूरज वहाँ तक कौन ले कर जाएगा

राह-रौ अब तक खड़े हैं राह में इस आस पर
कोई आएगा इधर और कुछ न कुछ कर जाएगा
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Balbir Rathi
एहसासात की बस्ती में जब हर जानिब इक सन्नाटा था
मैं आवाज़ों के जंगल में तब जाने क्या ढूँड रहा था

जिन राहों से अपने दिल का हर क़िस्सा मंसूब रहा है
अब तो ये भी याद नहीं है उन राहों का क़िस्सा क्या था

आज उसी के अफ़्सानों का महफ़िल महफ़िल चर्चा होगा
कल चौराहे पर तन्हा जो शख़्स बहुत ख़ामोश खड़ा था

यूँ जीवन रस कब देता है फिर से अपने ज़ख़्म कुरेदो
तुम ने आख़िर क्या सोचा था दर्द से क्यूँ सन्यास लिया था

ऐसी कोई बात नहीं थी उन राहों से लौट भी आते
लेकिन उन राहों पे किसी ने कुछ दिन अपना साथ दिया था

इस नगरी में लग-भग सब ने एक तरह से चोटें खाईं
लेकिन ज़ख़्मों को सहलाने का सब का अंदाज़ा जुदा था

तुम उन बेगानी राहों में आख़िर किस को ढूँड रहे हो
वो तो कब का लौट चुका है कल जो तुम्हारे साथ चला था
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Balbir Rathi
रात क्या ढल गई समुंदर में
घुल गई तीरगी समुंदर में

एक सुर्ख़ी पहाड़ से उभरी
फिर उतरती गई समुंदर में

इक सफ़ीना कहीं पे डूबा था
कितनी हलचल हुई समुंदर में

ख़ुद समुंदर की नींद टूट गई
रात कुछ यूँ ढली समुंदर में

ग़र्क़ होता गया कोई सहरा
धूल उड़ती गई समुंदर में

कोई तूफ़ाँ ज़रूर उठना था
अपनी कश्ती जो थी समुंदर में
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Balbir Rathi