Balwan Singh Azar

Balwan Singh Azar

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Balwan Singh Azar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Balwan Singh Azar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
पाँव मेरा फिर पड़ा है दश्त में
वो ही आवारा हवा है दश्त में

अब मिरी तन्हाई कम हो जाएगी
इक बगूला मिल गया है दश्त में

बस्तियों से भी ज़ियादा शोर है
कौन इतना चीख़ता है दश्त में

किस तरह ख़ुद को बचाएगा कोई
एक नादीदा बला है दश्त में

ख़ाक और कुछ ज़र्द पत्तों के सिवा
तुझ को 'आज़र' क्या मिला है दश्त में
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Balwan Singh Azar
लोग भूके हैं बहुत और निवाले कम हैं
ज़िंदगी तेरे चराग़ों में उजाले कम हैं

बद-सुलूकी भी निकल आई है ज़िंदानों से
बद-ज़बानों की ज़बानों पे भी ताले कम हैं

मय-कशी के लिए नायाब हैं जो सदियों से
चश्म-ए-साक़ी ने वही जाम उछाले कम हैं

तू ने बुज़दिल तो बनाए हैं बहुत से लेकिन
मिरे मालिक तिरी दुनिया में जियाले कम हैं

राह-ए-पुर-ख़ार से डरता है अभी तू 'आज़र'
ऐसा लगता है तेरे पावँ में छाले कम हैं
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Balwan Singh Azar
साक़ी खुलता है पैमाना खुलता है
सच्चे रिंदों पर मय-ख़ाना खुलता है

उन गलियों में लोग भटकते देखे हैं
जिन गलियों में दानिश-ख़ाना खुलता है

मुझ को पढ़ने आ जाते हैं लाखों लोग
जब भी ग़ज़लों का तह-ख़ाना खुलता है

तुम पर शायद चार बहारें खुलती हों
मुझ से तो हर पल वीराना खुलता है

सब की आँखों में आँसू आ जाते हैं
'आज़र' जब कोई दीवाना खुलता है
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Balwan Singh Azar
मिरे सफ़र में ही क्यूँ ये अज़ाब आते हैं
जिधर भी जाऊँ उधर ही सराब आते हैं

तलाश है मुझे अब तो उन्हीं फ़ज़ाओं की
जहाँ ख़िज़ाँ में भी अक्सर गुलाब आते हैं

किसी को मिलता नहीं इक चराग़ मीलों तक
किसी की बस्ती में सौ आफ़्ताब आते हैं

न निकला कीजिए रातों को घर से आप कभी
सड़क पे रात में ख़ाना-ख़राब आते हैं

खुला मकान है हर एक ज़िंदगी 'आज़र'
हवा के साथ दरीचों से ख़्वाब आते हैं
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Balwan Singh Azar
आप-बीती ज़रा सुना ऐ दश्त
शहर को देर तक रुला ऐ दश्त

किस को आवाज़ दूँ मैं तेरे सिवा
कौन है मेरा आश्ना ऐ दश्त

अब तो बारिश में भी नहीं हँसते
तेरे पेड़ों को क्या हुआ ऐ दश्त

क़ैस के पावँ में था रक़्साँ जो
वो बगूला किधर गया ऐ दश्त

ख़ाक ही ख़ाक को उड़ाती है
ख़ूब है तेरा सिलसिला ऐ दश्त
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Balwan Singh Azar
क्यूँ छुपाते हो किधर जाना है
दश्त से कह दो कि घर जाना है

मुझ में भी पहले उठेंगे तूफ़ाँ
फिर ख़मोशी को पसर जाना है

कोई कहता है कि मैं मलबा हूँ
किसी ने मुझ को खंडर जाना है

ख़ाक तो ख़ाक पे आ बैठेगी
ख़ाक को उड़ के किधर जाना है

उस की नादानी तो देखो 'आज़र'
फिर से दीवार को दर जाना है
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Balwan Singh Azar
सच है या फिर मुग़ालता है मुझे
कोई आवाज़ दे रहा है मुझे

एक उम्मीद जाग उठती है
आसमाँ जब भी देखता है मुझे

छीन लेता है मेरे सारे गुहर
जब समुंदर खँगालता है मुझे

ये मरासिम बहुत पुराने हैं
दश्त सदियों से जानता है मुझे

मेरी जानिब भी आ ज़रा फ़ुर्सत
अपने बारे में सोचना है मुझे
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Balwan Singh Azar
रात दिन इक बेबसी ज़िंदा रही
मेरी आँखों में नमी ज़िंदा रही

हार जाएगी यक़ीनन तीरगी
गर मुसलसल रौशनी ज़िंदा रही

पहले सन्नाटों में वो मौजूद थी
शोर में भी ख़ामुशी ज़िंदा रही

ज़िक्र होगा इस का भी सदियों तलक
कैसे कैसे ये सदी ज़िंदा रही

दर्द को 'आज़र' दुआ मैं क्यूँ न दूँ
दर्द ही से शाएरी ज़िंदा रही
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Balwan Singh Azar
हादसा होता रहा है मुझ में
बार-हा कोई मरा है मुझ में

मेरी मिट्टी को पता है सब कुछ
कौन कब कितना चला है मुझ में

ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र
कोई थक-हार गया है मुझ में

अपने अंदर मैं समेटूँ क्या क्या
सारा घर बिखरा पड़ा है मुझ में

कश्तियाँ डूब रही हैं 'आज़र'
एक तूफ़ान उठा है मुझ में
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Balwan Singh Azar
जब कोई टीस दिल दुखाती है
नब्ज़ कुछ देर रुक सी जाती है

आज आवारगी से कह दूँगा
एक चौखट मुझे बुलाती है

घुप-अँधेरे का फ़ाएदा ले कर
ओस फूलों पे बैठ जाती है

कल तलक तो वरक़ ही उड़ते थे
अब हवा हर्फ़ भी उड़ाती है

जागते हैं सभी शजर 'आज़र'
दश्त में किस को नींद आती है
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Balwan Singh Azar
गर मुझे मेरी ज़ात मिल जाए
इक नई काएनात मिल जाए

ख़्वाब है उस से बात करने का
कोई ख़्वाबों की रात मिल जाए

ग़म-ज़दा लोग सोचते होंगे
ज़िंदगी से नजात मिल जाए

कोई कुछ भी बदल नहीं सकता
जिस को जैसी हयात मिल जाए

पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए
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Balwan Singh Azar
दो क़दम साथ क्या चला रस्ता
बन गया मेरा हम-नवा रस्ता

बिछड़ा अपने मुसाफ़िरों से जब
कितना मायूस हो गया रस्ता

सब हैं मंज़िल की जुस्तुजू में यहाँ
कौन देखे बुरा भला रस्ता

ऐसी होने लगी थकन उस को
दिन के ढलते ही सो गया रस्ता

फिर नई काएनात देखूँगा
मेरे अंदर अगर मिला रस्ता

तू बड़ा ख़ुश-नसीब है 'आज़र'
तुझ पे आसान हो गया रस्ता
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Balwan Singh Azar
बे-ख़ुदी साथ है मज़े में हूँ
अपनी ही ज़ात के नशे में हूँ

अक्स जैसे हो कोई दरिया में
ऐसे पानी के बुलबुले में हूँ

तू भले मेरा ए'तिबार न कर
ज़िंदगी मैं तिरे कहे में हूँ

कोई मंज़िल कभी नहीं आई
रास्ते में था रास्ते में हूँ

मेरी वुसअ'त अजीब है 'आज़र'
फैल कर भी मैं दाएरे में हूँ
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Balwan Singh Azar