Chitra Bhardwaj suman

Chitra Bhardwaj suman

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Chitra Bhardwaj suman shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Chitra Bhardwaj suman's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
अभी हिज्र दामन में उतरा नहीं है
मगर वस्ल का भी तो चर्चा नहीं है

अभी धूप आँगन में खुल के न आई
अभी रात से रब्त टूटा नहीं है

ख़बर तेरे आने की जिस दिन मिली थी
उसी दिन से खिड़की पे पर्दा नहीं है

अना को लिए कब से बैठा है दरिया
जगह से समुंदर भी हिलता नहीं है

नदी आस में सूख जाएगी इक दिन
ये नादान बादल बरसता नहीं है

गया ज़ीस्त का आख़िरी मोड़ कह कर
किसी के लिए वक़्त ठहरा नहीं है

वहाँ इश्क़ का पाँव पड़ता है अक्सर
जहाँ से 'सुमन' आगे रस्ता नहीं है
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Chitra Bhardwaj suman
कह दिया यूँ ही बेवफ़ा मुझ को
बात आख़िर है क्या बता मुझ को

रौनक़ें गुम हैं मेरे चेहरे की
रोज़ कहता है आइना मुझ को

टूट कर शाख़ से बिखरना है
गर्म लगती है अब हवा मुझ को

चार दिन में ही थक गए थे क़दम
फिर मिला ग़म का आसरा मुझ को

दिल जो हारा तो फिर बचेगा क्या
ज़िंदगी अब न आज़मा मुझ को

ढंग का कुछ न वो बना पाया
उम्र भर चाक पर रखा मुझ को

हाथ में क़ैद है 'सुमन' क़िस्मत
रूठने तक गुमाँ रहा मुझ को
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Chitra Bhardwaj suman
अब मरीज़-ए-इश्क़ को कैसा ठिकाना चाहिए
आतिश-ए-दिल को हवा पर आशियाना चाहिए

लग गईं हैं दाव पर साँसें बिसात-ए-इश्क़ में
उस तरफ़ या इस तरफ़ तय हो ही जाना चाहिए

रूह को तेरी ज़रूरत इस क़दर है जान-ए-जाँ
ज़ीस्त के ख़ातिर ज़रूरी आब-ओ-दाना चाहिए

दिन ढले ही लौट आते हैं परिंदे शाख़ पर
हो गई अब रात तुझ को लौट आना चाहिए

अब थकन तक जा चुकी हैं हसरतें दीदार की
ख़ुश्क आँखों में 'सुमन' दरिया समाना चाहिए
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Chitra Bhardwaj suman
साथ मौसम के हवा को भी मचल जाना था
धूप को शम्स की बाहोँ में पिघल जाना था

शाम से सुब्ह तलक दिल था तिरी सरहद में
ऐसे हालात में तो तीर को चल जाना था

आओ अब देखो धुआँ होते हुए छप्पर को
या तो चिंगारी के लगते ही सँभल जाना था

याद यूँ भी नहीं रखने थे हमें कुछ रिश्ते
बाद इक वक़्त के मतलब ही बदल जाना था

उस की जानिब से ही कोशिश में कमी थी वर्ना
अब के भी तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ उसे खल जाना था

चाक के हाथ खड़े करने से पहले ही 'सुमन'
तेरी मिट्टी को किसी शक्ल में ढल जाना था
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Chitra Bhardwaj suman
जिस्म-ओ-जाँ पर किसी जोगी का मैं साया देखूँ
इश्क़ की ताल पे जोगन का थिरकना देखूँ

अपने चेहरे पे तेरी आँखों का पहरा देखूँ
प्यास दरिया का समुंदर में समाना देखूँ

क़तरा क़तरा जो नशा इश्क़ का उतरा मुझ में
रफ़्ता रफ़्ता तिरी साँसों में उतरता देखूँ

पहले मिस्रा में तुझे बाँध लिया है मैं ने
दूसरे मिस्रा में अब ख़ुद का बसेरा देखूँ

अब्र बन बरसे मेरे खेत से गुज़रा है अभी
मौसम-ए-आब में फ़स्लों को झुलसता देखूँ

चश्म की झील में वो अक्स उतर जाए फिर
शब तो आधी हो मगर चाँद को पूरा देखूँ

आरज़ू में तिरी बल खाए चली जाऊँ 'सुमन'
जब किसी बेल को मैं पेड़ से लिपटा देखूँ
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Chitra Bhardwaj suman
तमाम उम्र ही वहम-ओ-गुमान में गुज़री
मिरी तो प्यास सराबों के ध्यान में गुज़री

मैं चाँदनी थी ज़मीं पर उतर ही आना था
वो ठहरा चाँद तो शब आसमान में गुज़री

गली में इश्क़ की महँगा था वस्ल का बंगला
तो साँस हिज्र के सस्ते मकान में गुज़री

कहाँ पे करती है सरकार-ए-दिल रिआ'यत कुछ
कमाई इश्क़ की सारी लगान में गुज़री

ये उम्र आधी तो कार-ए-जहाँ में बीत गई
बची थी वो भी सफ़र की थकान में गुज़री
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Chitra Bhardwaj suman
कुछ दिनों तक ही शनासाई रही
फिर मिरी शब मिरी तन्हाई रही

रौनक़-ए-महफ़िल न आई काम कुछ
ज़िंदगी जब ख़ुद से उकताई रही

वक़्त-ए-रुख़्सत ख़ूब ही बरसी मगर
आँखों में ग़म की घटा छाई रही

धीरे धीरे ज़ख़्म आख़िर भर गए
बस ज़रा सूरत ही कजलाई रही

चलते चलते खो गए मंज़र कहीं
आँख जिन की भी तमन्नाई रही

ढल गया सूरज उजाले छीन कर
रात के सर बज़्म-आराई रही

याद आएगी कहाँ उस को 'सुमन'
इश्क़ में अब वो न गहराई रही
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Chitra Bhardwaj suman
निगाह-ए-मस्त से ओझल हैं मंज़िलें दिल की
हैं अपनी आख़िरी साँसों पे चाहतें दिल की

बहाए जाता है दरिया-ए-इश्क़ आख़िर तक
भले ही लाख सँभाले हों धड़कनें दिल की

ज़रा सी देर भी बैठा नहीं गया नज़दीक
हवा सी हो गईं आवारा राहतें दिल की

जो ख़ुद को क़ाबिल-ए-कार-ए-जहाँ भी रखना था
तो हम भी ख़ाक ही कर डालें ख़्वाहिशें दिल की

इसी में चैन-ओ-सुकूँ क्यों है जिस ने छीना है
समझ से ही रहें बाहर हैं साज़िशें दिल की

पकड़ रही हो थकन जब वजूद के बाज़ू
उठाए कोई भला कैसे वहशतें दिल की

ये किस गली से 'सुमन' इश्क़ अपना गुज़रा है
लिपटती ही गईं दामन से उलझनें दिल की
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Chitra Bhardwaj suman