Daud Ghazi

Daud Ghazi

@daud-ghazi

Daud Ghazi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Daud Ghazi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
जज़्बा-ए-नौ भी तो है हसरत-ए-नाकाम के साथ
ख़्वाहिश-ए-सुब्ह उभरती तो है हर शाम के साथ

हो वो तहसीन के हमराह कि दुश्नाम के साथ
आ तो जाता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ

तेरे कूचे से भी गुज़रा हूँ मैं ऐ हुस्न-ए-तलब
सुब्ह के साथ कभी और कभी शाम के साथ

मुश्किलें राह में आती तो बहुत हैं लेकिन
याद कर लेता हूँ मैं तुझ को हर इक गाम के साथ

पहले मेरा था ये ग़म अब है ज़माने भर का
ग़म भी गर्दिश में रहा गर्दिश-ए-अय्याम के साथ

झूमती आती है ख़ुशबू से भरी आती है
जब भी आती है सबा आप के पैग़ाम के साथ
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Daud Ghazi
जब तसव्वुर में किसी को पास पा लेता हूँ मैं
इक निराले कैफ़ को दिल में बसा लेता हूँ मैं

जब भी याद आती हैं तेरे गेसुओं की राहतें
रात की तारीकियों में मुस्कुरा लेता हूँ मैं

चाहता हूँ जब कि तेरी याद को रौशन करूँ
ग़म की वादी में नई शमएँ जला लेता हूँ मैं

राह में सूखा हुआ पत्ता भी मिलता है अगर
उस परेशाँ-हाल को साथी बना लेता हूँ मैं

सोचता हूँ कितना ग़म-अंदोज़ है तेरा ख़याल
फिर उसी से इक नया जादू जगा लेता हूँ मैं
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Daud Ghazi
दिन हो या रात हम को चलना है
हम को चलना है शब को ढलना है

शिद्दत-ए-ग़म से लड़खड़ाते हैं
लड़खड़ा कर मगर सँभलना है

दोस्तो कारवाँ बना के चलो
रहगुज़ारों का रुख़ बदलना है

हर ग़म-ए-ज़ीस्त है क़ुबूल मगर
हर ग़म-ए-ज़ीस्त को बदलना है
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Daud Ghazi
तमाम वक़्त तुम्हीं से कलाम करते हैं
शब-ए-फ़िराक़ का यूँ एहतिमाम करते हैं

सजाए रखते हैं हर वक़्त हम नए दिन-रात
तुम्हारे वास्ते ये इल्तिज़ाम करते हैं

ख़याल-ए-यार से करते हैं सुब्ह का आग़ाज़
उमीद-ए-यार के साए में शाम करते हैं

कहाँ मिटे हैं किसी से नुक़ूश-ए-अहल-ए-शौक़
जो ना-समझ हैं वो ये सई-ए-ख़ाम करते हैं

छुपा के रक्खे हैं साक़ी ने साग़र-ओ-मीना
इसी सबब तो फ़ुग़ाँ तिश्ना-काम करते हैं

ये बे-सबब तो नहीं इतने शोहरा-ए-आफ़ाक़
तुम्हारे नाम से हम अपना नाम करते हैं

ग़म-ए-हयात से आदाब-ए-ज़िंदगी सीखे
ग़म-ए-हयात का हम एहतिराम करते हैं
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Daud Ghazi
सितम का ख़ौफ़ नहीं है अलम की बात नहीं
रह-ए-तलब में किसी पेच-ओ-ख़म की बात नहीं

विसाल-ए-यार की उम्मीद भी अजब शय है
हज़ार ग़म हैं मगर फिर भी ग़म की बात नहीं

चलो कि मिल के मदावा-ए-ग़म करें हम लोग
है सब को एक ही ग़म बेश-ओ-कम की बात नहीं

तुम्हारी ज़ुल्फ़ है मुमकिन है ख़ुद सँवर जाए
तुम्हारी ज़ुल्फ़ में कुछ पेच-ओ-ख़म की बात नहीं

सितमगरों पे इन अश्कों का क्या असर होगा
हयात-ए-जेहद है कुछ चश्म-ए-नम की बात नहीं
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Daud Ghazi
मिज़ाज-ए-आलम-ए-इम्काँ है बरहम देखिए क्या हो
सितम-कश पै-ब-पै होते हैं बाहम देखिए क्या हो

गए वो दिन कि आवाज़ों पे ख़ामोशी का पहरा था
ब-हर सू गूँजता है सोज़-ए-पैहम देखिए क्या हो

ये कैसा रंग-ए-महफ़िल है परेशाँ है बहुत साक़ी
बने बैठे हैं सब मय-ख़्वार हमदम देखिए क्या हो

चमन में रंग लाएगी सबा की आबला-पाई
पिलाती है लहू शाख़ों को शबनम देखिए क्या हो

नज़र टकरा रही है अब शुआ'-ए-मेहर-ए-ताबाँ से
हुई है ख़ुश्क कब की चश्म-ए-पुर-नम देखिए क्या हो

रह-ए-ग़म मुख़्तसर कर दी है बज़्म-ए-ना-शकेबा ने
हुए हैं मंज़िलों के फ़ासले कम देखिए क्या हो
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Daud Ghazi
आ के साहिल के क़रीं जाता हूँ साहिल से परे
आ के मंज़िल पर चला जाता हूँ मंज़िल से परे

अपनी मंज़िल पर पहुँच कर सोचने लगता हूँ मैं
उफ़ रे वो मंज़र सुहाना है जो मंज़िल से परे

देख वो लहरों का मंज़र देख वो तूफ़ाँ का खेल
देख ऐ साहिल-नशीं क्या शय है साहिल से परे

रात-दिन देती ही रहती है तिरे जलवोें का लुत्फ़
वो जो इक तस्वीर रक्खी है कहीं दिल से परे

देख ऐ शौक़-ए-नज़र नज़्ज़ारा-हा-ए-दिल-फ़रेब
पर्दा-हा-ए-जुरअत-आमोज़ उस के महमिल से परे
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Daud Ghazi
ग़म-ए-हयात में जैसे भी ज़िंदगी की है
तुम्हारी याद तो लेकिन कभी कभी की है

जो ग़म मिला था तो ये चाहा ग़म-ए-ज़ियाद मिले
सियाह शब में तमन्ना-ए-रौशनी की है

हयात साथ में लाई है मौत का सामाँ
किसी ने हम से बहुत ख़ूब दिल-लगी की है

ये ग़म की रात नहीं जिस की इंतिहा कोई
तिरे बग़ैर बसर कुछ अजीब सी की है

निगाह-ए-यार का इस में कोई क़ुसूर नहीं
कि हम ने दिल की ख़राबी तो आप ही की है
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