Hafeez Momin

Hafeez Momin

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Hafeez Momin shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Momin's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
शोख़ी अदा ग़ुरूर शरारत ख़रीदिए
चाँदी उछालिए तो क़यामत ख़रीदिए

अस्लाफ़ के नुक़ूश किताबों में बंद हैं
बाज़ार से किसी की शबाहत ख़रीदिए

अटकी हुई है रूह पुरानी तराश में
किस दिल से अस्र-ए-हाल की जिद्दत ख़रीदिए

अहल-ए-जहाँ का और बदलने लगा मज़ाक़
फ़िक्र-ओ-नज़र भी हस्ब-ए-ज़रूरत ख़रीदिए

ज़ाहिर बहुत हसीन है बातिन घिनावना
पछ्ताइएगा आप मुझे मत ख़रीदिए

क़ुरआन खोलने की ज़रूरत नहीं रही
बिकती है सुब्ह-ओ-शाम तिलावत ख़रीदिए

पक जाएगा तो आप टपक जाएगा जनाब
आँगन में शाख़ आई है फल मत ख़रीदिए
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Hafeez Momin
कैसा चक्कर काट के आना पड़ता है
तेरे मेरे बीच ज़माना पड़ता है

फिर अश्कों की क़िस्मत जागे या सोए
पहले तो आँखों में आना पड़ता है

मेरी मानो मत इस दर्जा ख़्वाब बुनो
ख़्वाबों का महसूल चुकाना पड़ता है

ख़ामोशी तो मर जाने का हासिल है
ज़िंदा रहने शोर मचाना पड़ता है

तुम बै-रागी तुम क्या जानो 'मोमिन' जी
उल्फ़त में क्या कर जाना पड़ता है
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Hafeez Momin
हर दरीचा धुआँ उगलता है
बंद कमरे में कौन जलता है

चियूँटियों के भी पर निकल आए
कौन पैदल ज़मीं पे चलता है

आसमाँ छू नहीं सकेगा कभी
रोज़ दिया मगर उछलता है

रेंगती है तुम्हारी मुन्नी ख़ूब
मेरा मुन्ना भी पाँव चलता है

बीत जाती है हर घड़ी 'मोमिन'
वक़्त टाले बग़ैर टलता है
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Hafeez Momin
जिसे है ज़ो'म कि उस ने हवा के पर बाँधे
अगर है दम तो हमारी दुआ के पर बाँधे

उठाए हाथ अज़ाब-ओ-बला के पर बाँधे
ये किस दुआ ने किसी बद-दुआ' के पर बाँधे

हुई न आज भी तौबा के टूटने की सबील
ख़ुदा ने आज भी काली घटा के पर बाँधे

कोई तो हो जो उसे रोक ले तबाही से
कोई तो हो जो दिल-ए-मुब्तला के पर बाँधे

हमारी सोच की परवाज़ रोकना था मुहाल
हमीं ने जान की बाज़ी लगा के पर बाँधे

कई दिनों से किसी का सलाम है न पयाम
मिरे अदू की बाज़ी लगा के पर बाँधे

शिफ़ा की आस लगाए मरीज़ बैठा है
दुआ को हाथ उठाए दवा के पर बाँधे

'हफ़ीज़' मौत से लुक़्मान बच सके कब तक
बड़े हकीम थे कब तक क़ज़ा के पर बाँधे
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Hafeez Momin
कुछ करने की मोहलत कम है
अब उम्रों में बरकत कम है

अक्सर बाहर ही रहता हूँ
क्या मेरा घर जन्नत कम है

चिड़ जाता हूँ लड़ जाता हूँ
सच सहने की आदत कम है

उन से आगे कैसे जाऊँ
जिन से मेरी क़िस्मत कम है

राई राई देने वाले
मुझ को पर्बत पर्बत कम है

सादा सादा बातें कीजे
अब ज़ेहनों को फ़ुर्सत कम है

'मोमिन' के अशआ'र सुनाओ
अफ़्सानों में लज़्ज़त कम है
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Hafeez Momin
तकल्लुफ़ात के सहरा में खो गया कोई
क़रीब आ के बहुत दूर हो गया कोई

सिवाए अपने हमें कुछ नज़र नहीं आता
हमारी आँख में सूरज समो गया कोई

लगाएँ बाग़ फलों के हुई न ये तौफ़ीक़
उसे भी चाट गए हम जो बो गया कोई

ज़मीन ओढ़ के सोना सभी को है लेकिन
'हफ़ीज़' वक़्त से पहले ही सो गया कोई
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Hafeez Momin
उन के होंटों का वो अंदाज़ कहीं उफ़ जैसे
और तस्वीर मुसव्विर का तसव्वुफ़ जैसे

इतने ठहराव से वो बात किया करते हैं
एक से दूसरे सज्दे में तवक़्क़ुफ़ जैसे

इस तरह ख़ुद को ज़माने से बचा रखा है
उन को मंज़ूर नहीं ख़ुद में तसर्रुफ़ जैसे

यूँ हुआ आ के मिरे दर से पलट जाती है
कुछ बताने में हो ज़ालिम को तकल्लुफ़ जैसे

हर तरफ़ शोर है ख़ामोश खड़ा है कोई
हो रहा हो उसे होने का तअस्सुफ़ जैसे

इस तरह वक़्त ने बदनाम किया है 'मोमिन'
कोई महफ़िल में कराता हो तआ'रुफ़ जैसे
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Hafeez Momin
अनोखा रूप धारा है निराला क़द निकाला है
ज़रा सी शाख़ ने कैसा बड़ा बरगद निकाला है

ख़ुशामद करने वाले के हुकूमत हाथ आई है
जो अपनी जान पर खेला उसे सरहद निकाला है

हज़ारों में किसी इक आध को दुनिया अता की है
हमारे वास्ते उस ने यही फ़ीसद निकाला है

कि उस को सूझती रहती है अपनी सी चलाने की
कहीं तबरेज़ भेजा है कहीं सरमद निकाला है

बहुत आसान है अल्लाह को मंज़र बदल देना
अभी मसनद-नशीनी है अभी मसनद निकाला है

अहद में मीम रखा हम्द से पहले अलिफ़ रखा
अजब अंदाज़ से अल्लाह ने अहमद निकाला है

कमाना और खाना ऐश करना और मर जाना
नहीं 'मोमिन' अगर जीने का ये मक़्सद निकाला है
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Hafeez Momin
बातों से तेरी बात की ख़ुशबू निकल पड़े
पहचान का कहीं कोई पहलू निकल पड़े

कम-कम कहूँ मैं शेर सुनाऊँ बहुत ही कम
क्या जो किसी ग़ज़ल से कभी तू निकल पड़े

बोसा कहा था आप ने अबरू चढ़ा लिए
इतनी ज़रा सी बात पे चाक़ू निकल पड़े

इस बार उस ने आप से तुम कह दिया हमें
ऐसी ख़ुशी कि आँख से आँसू निकल पड़े

कहते हैं रौशनी की हिफ़ाज़त करेंगे हम
सूरज की देख-भाल को जुगनू निकल पड़े

कानों में रस थी घोलती संतों की बानीयाँ
त्रिशूल ले के आज के साधू निकल पड़े

इफ़्लास के लिबास में ये बात है अगर
शाहाना आन-बान से उर्दू निकल पड़े

जब दीन की मदद को पुकारा गया 'हफ़ीज़'
फाँका न अपने हाथ का सत्तू निकल पड़े
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Hafeez Momin