Ibn-e-Mufti

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Ibn-e-Mufti shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ibn-e-Mufti's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
हम से मिलते थे सितारे आप के
फिर भी खो बैठे सहारे आप के

कैसा जादू है समझ आता नहीं
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के

हम से शायद मो'तबर ठहरी सबा
जिस ने ये गेसू सँवारे आप के

आप की नज़र-ए-करम के मुंतज़िर
कब से बैठे हैं द्वारे आप के

कोई उस की आँख को भाएगा क्यूँ
जिस ने देखे हों नज़ारे आप के

बिन तिरे साँसें भी अब चलती नहीं
हर घड़ी चाहें, इशारे आप के

मुस्कुरा कर देखिए तो एक बार
कहकशाँ, ये चाँद तारे आप के

झूट है 'मुफ़्ती' भुला बैठे हो सब
क्यूँ थे पलकों पर सितारे आप के
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Ibn-e-Mufti
दिल वही अश्क-बार रहता है
ग़म से जो हम-कनार रहता है

मैं ने देखा ख़िरद के काँधों पर
इक जुनूँ सा सवार रहता है

लब तबस्सुम में हो गए मश्शाक़
दिल मगर सोगवार रहता है

एक लम्हे भी सोच लूँ उन को
मुद्दतों इक ख़ुमार रहता है

दिल रहे बे-कली के घेरे में
ज़ेहन पे तू सवार रहता है

तेरे ख़्वाबों की लत लगी जब से
रात का इंतिज़ार रहता है

सच के धागे से जो बने रिश्ता
उम्र भर उस्तुवार रहता है

तेरे दिल ने भी पढ़ लिया कलमा
जिस में ये गुनहगार रहता है

जब से जोड़ा है आप से रिश्ता
दामन-ए-तार, तार रहता है

वो तसव्वुर में इक घड़ी आएँ
देर तक दिल बहार रहता है

चाँद से इस लिए है प्यार मुझे
ये भी यारों का यार रहता है

घर में आते ही मह-जबीं ने कहा
याँ तो अख़्तर शुमार रहता है

अब तो कर डालिए वफ़ा उस को
वो जो वादा उधार रहता है

इक तरफ़ गर्दिशें ज़माने की
इक तरफ़ तेरा प्यार रहता है

तिरे दर से जुड़ा हुआ मुफ़्लिस
इश्क़ में माल-दार रहता है

माँ ने दे दी दुआ तो हश्र तलक
उस का बाँधा हिसार रहता है

दिल में सज्दे किया करो 'मुफ़्ती'
इस में पर्वरदिगार रहता है
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Ibn-e-Mufti
ग़लत-फ़हमी की सरहद पार कर के
मिटा दो फ़ासले ईसार कर के

ये कारोबार भी कब रास आया
ख़सारे में रहे हम प्यार कर के

लगीं सदियाँ बनाने में जो रिश्ते
वो इक पल में चले मिस्मार कर के

गले मिल कर ही दूरी दूर होगी
मिलेगा क्या हमें तकरार कर के

सगे भाई भी अब इक छत के नीचे
वो रहते हैं मगर दीवार कर के

मसाइल हैं कि बढ़ते जा रहे हैं
गुलों का बरमला इज़हार कर के

गँवा दी इज़्ज़त-ए-सादात 'मुफ़्ती'
मोहब्बत में निगाहें चार कर के
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Ibn-e-Mufti
फिर से वो लौट कर नहीं आया
फिर दुआ में असर नहीं आया

चैन आएगा कैसे आज की शब
तारे निकले, क़मर नहीं आया

लिखते देखा था ख़्वाब में उन को
अब तलक नामा-बर नहीं आया

मेरे मरने पे आया सारा जहाँ
जो था इक बा-ख़बर नहीं आया

चल बसी माँ लिए खुली आँखें
उस का, नूर-ए-नज़र नहीं आया

यूँ तो पत्थर बहुत से देखे हैं
कोई तुम सा नज़र नहीं आया

शाम ढलने लगी है अब 'मुफ़्ती'
सुब्ह का भूला घर नहीं आया
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Ibn-e-Mufti
शौक़ जब भी बंदगी का रहनुमा होता नहीं
ज़िंदगी से ज़िंदगी का हक़ अदा होता नहीं

क्या समझ आएँगी तुम को इश्क़ की बारीकियाँ
दिल तुम्हारा जब तलक दर्द-आश्ना होता नहीं

रूह ओ तन का इश्क़ ये क़ाएम रहेगा दाइमी
ख़त्म ब'अद-ए-मर्ग भी ये सिलसिला होता नहीं

कौन है जो जुर्म करने को है शब का मुंतज़िर
रौशनी में दिन की यारो क्या भला होता नहीं

ग़ालिबन होता मुझे भी घर के गिरने का गिला
राहगीरों का अगर ये रास्ता होता नहीं

बद-गुमानी की फ़ज़ा में क्या सफ़ाई दें तुम्हें
इस फ़ज़ा में कोई भी हल मसअला होता नहीं

इक ज़रा सी बात पे ये मुँह बनाना रूठना
इस तरह तो कोई अपनों से ख़फ़ा होता नहीं

कोई गुस्ताख़ी तो की है नाव ने गिर्दाब से
वर्ना यूँ साहिल पे कोई ग़म-ज़दा होता नहीं

कमरा-ए-तक़दीर में आती उरूस-ए-आरज़ू
वक़्त-ए-ना-हंजार का जो फ़ैसला होता नहीं

आँख से पीने का भी साक़ी ने माँगा है हिसाब
इस रविश से यारो कोई मय-कदा होता नहीं

'मुफ़्ती' देखो महर पल्टा है मिरी तक़दीर का
देखते हैं किस तरह सज्दा अदा होता नहीं
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Ibn-e-Mufti
वो ख़्वाब जैसा था गोया सराब लगता था
हसीन ऐसा कि फ़ख़्र-ए-गुलाब लगता था

हलीम ऐसा कि दीवानी एक दुनिया थी
कि उस से हाथ मिलाना सवाब लगता था

निभाना रिश्तों का नाज़ुक कठिन अमल निकला
जो देखने में तो सीधा हिसाब लगता था

सुराही-दार थी गर्दन नशा भरे आरिज़
सरापा उस का मुजस्सम शराब लगता था

वो बोलता तो फ़ज़ा नग़्मगी में रच जाती
गले में हो कोई उस के रबाब लगता था

कहानी एक नई देती होंट की जुम्बिश
वो लब जो खोलता गोया किताब लगता था

वो शख़्स आज गुरेज़ाँ है साए से मेरे
जिसे पसीना भी मेरा गुलाब लगता था

अमल में फ़े'अल में उस के तज़ाद था 'मुफ़्ती'
अगरचे दिल में उतरता ख़िताब लगता था
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Ibn-e-Mufti
बर्क़ ने जब भी आँख खोली है
आशियानों ने ख़ाक रोली है

याद का क्या है आ गई फिर से
आँख का क्या है फिर से रो ली है

तुम बिछा लो मुसल्ला-ए-चाहत
मैं ने दहलीज़ दिल की धो ली है

दिल की बातों को दिल समझता है
दिल की बोली अजीब बोली है

पर्दा उठते ही मेरी नज़रों से
काएनात-ए-यक़ीन डोली है

मुस्कुराए न चाँद क्यूँ 'मुफ़्ती'
आई जो चाँदनी की डोली है
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Ibn-e-Mufti
नफ़रतें न अदावतें बाक़ी हैं
गर रहेंगी तो उल्फ़तें बाक़ी

रह ही जाते हैं सब फ़साने यहाँ
हैं जो बाक़ी मोहब्बतें बाक़ी

टिमटिमाता दिया है बुझने को
रह गईं कुछ ही साअतें बाक़ी

ख़त्म होंगी न ये मुलाक़ातें
यार ज़िंदा तो सोहबतें बाक़ी

जिन पे नाज़ाँ थे ये ज़मीन ओ फ़लक
अब कहाँ हैं वो सूरतें बाक़ी

आज भी हैं बहुत से ना-बीना
देखी जिन में बसारतें बाक़ी

बन के तावीज़ कुछ गले में हैं
भूले क़ुर्अां की सूरतें बाक़ी

हश्र में और लहद में जाना है
रह गईं दो ही हिजरतें बाक़ी

औज तो बंदगी में मुज़्मर है
हेच सारी हैं रिफ़अतें बाक़ी
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Ibn-e-Mufti
कर बुरा तो भला नहीं होता
कर भला तो बुरा नहीं होता

इक वही लापता नहीं होता
जिस को अपना पता नहीं होता

सब निशाने अगर सहीह होते
तीर कोई ख़ता नहीं होता

कौन आशिक़ है कौन है माशूक़
प्यार में फ़ैसला नहीं होता

कोई ऐसी जगह ही दिखलाओ
जिस जगह पर ख़ुदा नहीं होता

कूचा-ए-यार जो न जाता हो
रास्ता रास्ता नहीं होता

कामयाबी के रास्तों की तरफ़
बीच का रास्ता नहीं होता

सारी दुनिया तो हो गई मेरी
इक फ़क़त तू मिरा नहीं होता

दिल नज़र पर अगर नज़र रखते
प्यार का हादसा नहीं होता

जब तलक तू न हो ख़यालों में
कोई सज्दा रवा नहीं होता

उस की मख़मूर आँख के आगे
मय-कदा मय-कदा नहीं होता

कोशिशें ख़ुद ही करना पड़ती हैं
भीड़ में रास्ता नहीं होता

एक अर्सा हुआ कि नींद से भी
आमना-सामना नहीं होता

प्यार हो जाए कब कहाँ किस से
ये किसी को पता नहीं होता

हम ने देखा है रू-ब-रू उन के
आईना आईना नहीं होता

सदक़ा ख़ैरात कीजिए साहब
मुस्कुराना बुरा नहीं होता

क्या करामत भी अब नहीं होगी
माना अब मोजज़ा नहीं होता

हाथ मुश्किल में छोड़ जाते हो
ये तो फिर थामना नहीं होता

पहले नज़रें अटूट थीं और अब
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

'मुफ़्ती' हम ही भँवर-नसीब रहे
वर्ना साहिल पे क्या नहीं होता
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Ibn-e-Mufti