Idris Azad

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@idris-azad

Idris Azad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Idris Azad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जब छोड़ गया था तो कहाँ छोड़ गया था लौटा है तो लगता है कि अब छोड़ गया है — Idris Azad
तेरी ता'रीफ़ करने लग गया हूँ मोहब्बत ने दियानत छीन ली है — Idris Azad
ईद का चाँद तुम ने देख लिया चाँद की ईद हो गई होगी — Idris Azad
इतने ज़ालिम न बनो कुछ तो मुरव्वत सीखो तुम पे मरते हैं तो क्या मार ही डालोगे हमें — Idris Azad
मैं ख़ुद उदास खड़ा था कटे दरख़्त के पास परिंदा उड़ के मेरे हाथ पर उतर आया — Idris Azad

Ghazal

उजलत को इख़्तियार न कर इंतिज़ार कर ख़ुद पर जुनूँ सवार न कर इंतिज़ार कर ये इज़्तिरार ज़ोफ़-ए-जुनूँ की दलील है यूँँ ख़ुद को बे-क़रार न कर इंतिज़ार कर माना कि शहर-ए-दिल की फ़सीलों में छेद हैं क़ाएम अभी हिसार न कर इंतिज़ार कर बेटा ये उम्र ताब तलब काटने की है इस कम-सिनी में प्यार न कर इंतिज़ार कर मुमकिन है शैख़-ए-जाँ की तजल्ली फ़रेब हो दुनिया-ओ-दीं निसार न कर इंतिज़ार कर होंगे ज़रूर ख़त्म ये दर्दों के सिलसिले दरिया-ए-सब्र पार न कर इंतिज़ार कर रज़्म-ए-वफ़ा में सह के दिखा तीर-ए-तंज़ को तेग़-ए-ज़बाँ से वार न कर इंतिज़ार कर कह कह के बार बार जुदाई की बात को तू और पाएदार न कर इंतिज़ार कर दश्त-ए-जुनूँ अभी है ग़ुबार-ए-हवा से में यूँँ शुतुर बे-महार न कर इंतिज़ार कर 'आज़ाद' हो गए हैं असीरान-ए-रास्ती अब दिल का ए'तिबार न कर इंतिज़ार कर — Idris Azad
यूँँ ब-ज़ाहिर तो पस-ए-पुश्त न डालोगे हमें जानते हैं बड़ी इज़्ज़त से निकालोगे हमें अपना घर-बार है अबआ'द-ए-मकानी से बुलंद वक़्त को ढूँडने निकलोगे तो पा लोगे हमें इतने ज़ालिम न बनो कुछ तो मुरव्वत सीखो तुम पे मरते हैं तो क्या मार ही डालोगे हमें तुम नहीं आए नहीं आए मगर सोचा था हम अगर रूठ भी जाएँ तो मना लोगे हमें हम तिरे सामने आएँगे नगीना बन कर पहले ये वा'दा करो फिर से चुरा लोगे हमें तुम भी थे बज़्म में ये सोच के हम ने पी ली हम अगर मस्त हुए भी तो सँभालोगे हमें क़ाबिल-ए-रहम बने फिरते हैं इस आस पे हम अपने सीने से किसी रोज़ लगा लोगे हमें हम बड़ी क़ीमती मिट्टी से बनाए गए हैं ख़ुद को हम बेचना चाहेंगे तो क्या लोगे हमें हम भी कुछ अपनी तमन्नाएँ सुनाएँगे तुम्हें जब तुम अपनी ये तमन्नाएँ सुना लोगे हमें तुम से हम दूर चले आए हैं सदियों के क़रीब रौशनी बन के अगर आओ तो आ लोगे हमें हम न भूलेंगे तुम्हें जितनी भी कोशिश कर लो भूलने के लिए हर बार ख़यालोगे हमें — Idris Azad
वो हश्र-ख़ेज़ इनायात पर उतर आया बला का रंग है और रात पर उतर आया मैं ख़ुद उदास खड़ा था कटे दरख़्त के पास परिंदा उड़ के मेरे हाथ पर उतर आया वो मुझ से तोड़ने वाला है फिर कोई वा'दा वो फिर सियासी बयानात पर उतर आया तेरी जो बात मेरे दिल को हाथ डालती है मैं क्यूँ घुमा के उसी बात पर उतर आया ख़ुदा कहाँ है बस इतना सवाल था मेरा ख़ुदा का बंदा मेरी ज़ात पर उतर आया वो पहले-पहल तो मुझ से ही प्यार करता था फिर उस के बा'द कमालात पर उतर आया ज़रा सी बात थी अश्कों को पी गया होता ग़रीब शख़्स था औक़ात पर उतर आया गया तो फिर मेरे तकिए से नोट निकले हैं अमीर होते ही ख़ैरात पर उतर आया वो ला-जवाब हुआ जब ज़बान से ख़ामोश तो उस का चेहरा सवालात पर उतर आया — Idris Azad