शम्अ-ए-तन्हा की तरह सुब्ह के तारे जैसे
शहर में एक ही दो होंगे हमारे जैसे
शहर में एक ही दो होंगे हमारे जैसे
छू गया था कभी इस जिस्म को इक शोला-ए-दर्द
आज तक ख़ाक से उड़ते हैं शरारे जैसे
हौसले देता है ये अब्र-ए-गुरेज़ाँ क्या क्या
ज़िंदा हूँ दश्त में हम उस के सहारे जैसे
सख़्त-जाँ हम सा कोई तुम ने न देखा होगा
हम ने क़ातिल कई देखे हैं तुम्हारे जैसे
दीदनी है मुझे सीने से लगाना उस का
अपने शानों से कोई बोझ उतारे जैसे
अब जो चमका है ये ख़ंजर तो ख़याल आता है
तुझ को देखा हो कभी नहर किनारे जैसे
उस की आँखें हैं कि इक डूबने वाला इंसाँ
दूसरे डूबने वाले को पुकारे जैसे
10
0 Likes
रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़
कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है
आज कल अपना सफ़र तय नहीं करता कोई
हाँ सफ़र का सर-ओ-सामान बहुत करता है
9
1 Like
देख लेता है तो खिलते चले जाते हैं गुलाब
मेरी मिट्टी को ख़ुश-आसार किया है उस ने
मेरी मिट्टी को ख़ुश-आसार किया है उस ने
5
17 Likes
चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना
तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छू लेना
तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छू लेना
ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में
तुम उड़ते उड़ते कहीं आसमाँ न छू लेना
नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना
हमारे लहजे की शाइस्तगी के धोके में
हमारी बातों की गहराइयाँ न छू लेना
उड़े तो फिर न मिलेंगे रफ़ाक़तों के परिंद
शिकायतों से भरी टहनियाँ न छू लेना
मुरव्वतों को मोहब्बत न जानना 'इरफ़ान'
तुम अपने सीने से नोक-ए-सिनाँ न छू लेना
2
2 Likes










