Kaami Shah

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Kaami Shah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kaami Shah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
वैसे तुम अच्छी लड़की हो
लेकिन मेरी क्या लगती हो

मैं अपने दिल की कहता हूँ
तुम अपने दिल की सुनती हो

झीलों जैसी आँखों वाली
तुम बेहद गहरी लगती हो

मौज-ए-बदन में रंग हैं इतने
लगता है रंगों से बनती हो

फूल हुए हैं ऐसे रौशन
जैसे इन में तुम हँसती हो

जंगल हैं और बाग़ हैं मुझ में
तुम इन से मिलती-जुलती हो

यूँ तो बशर-ज़ादी हो लेकिन
ख़ुशबू जैसी क्यूँ लगती हो

अक्सर सोचता रहता हूँ मैं
ख़ल्वत में तुम क्या करती हो

वो क़र्या आबाद हमेशा
जिस क़र्ये में तुम रहती हो
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Kaami Shah
अगर मैं सच कहूँ तो सब्र ही की आज़माइश है
ये मिट्टी इम्तिहाँ प्यारे ये पानी आज़माइश है

निकल कर ख़ुद से बाहर भागने से ख़ुद में आने तक
फ़रार आख़िर है ये कैसा ये कैसी आज़माइश है

तलाश-ए-ज़ात में हम को किसी बाज़ार-ए-हस्ती में
तिरा मिलना तिरा खोना अलग ही आज़माइश है

नबूद ओ बूद के फैले हुए इस कार-ख़ाने में
उछलती कूदती दुनिया हमारी आज़माइश है

मिरे दिल के दरीचे से उचक कर झाँकती बाहर
गुलाबी एड़ियों वाली अनोखी आज़माइश है

ये तू जो ख़ुद पे नाफ़िज़ हो गया है शाम की सूरत
तो जानी शाम की कब है ये तेरी आज़माइश है

दिए के और हवाओं के मरासिम खुल नहीं पाते
नहीं खुलता कि इन में से ये किस की आज़माइश है
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Kaami Shah
अगर कार-ए-मोहब्बत में मोहब्बत रास आ जाती
तुम्हारा हिज्र अच्छा था जो वसलत रास आ जाती

गला फाड़ा नहीं करते रफ़ू दरयाफ़्त करने में
अगर बेकार रहने की मशक़्क़त रास आ जाती

तुम्हें सय्याद कहने से अगर हम बाज़ आ जाते
हमें भी इस तमाशे में सुकूनत रास आ जाती

फ़क़त ग़ुस्सा पिए जाते हैं रोज़ ओ शब के झगड़े में
कोई हंगामा कर सकते जो वहशत रास आ जाती

अगर हम पार कर सकते ये अपनी ज़ात का सहरा
तो अपने साथ रहने की सहूलत रास आ जाती
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Kaami Shah
नबूद ओ बूद के मंज़र बनाता रहता हूँ
मैं ज़र्द आग में ख़ुद को जलाता रहता हूँ

तिरे जमाल का सदक़ा ये आतिश-ए-रौशन
चराग़ आब-ए-रवाँ पर बहाता रहता हूँ

दुआएँ उस के लिए हैं सदाएँ उस के लिए
मैं जिस की राह में बादल बिछाता रहता हूँ

उदास धुन है कोई उन ग़ज़ाल आँखों में
दिए के साथ जिसे गुनगुनाता रहता हूँ

अजीब सुस्त-रवी से ये दिन गुज़रते हैं
मैं आसमान पे शामें बनाता रहता हूँ

मैं उड़ता रहता हूँ नीले समुंदरों में कहीं
सो तितलियों के लिए ख़्वाब लाता रहता हूँ

ये मुझ में फैल रहा है जो इज़्तिराब-ए-शदीद
तो फिर ये तय है उसे याद आता रहता हूँ
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Kaami Shah
दिल की आवाज़ में क़याम करें
आ मिरे यार आ कलाम करें

तितलियाँ ढूँडने में दिन काटें
और जंगल में एक शाम करें

आइनों को बुलाएँ घर अपने
और चराग़ों का एहतिमाम करें

उस के होंटों को ध्यान में रख कर
सुर्ख़ फूलों का इंतिज़ाम करें

जिस के दम से है ये सुख़न आबाद
ये ग़ज़ल भी उसी के नाम करें
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Kaami Shah
इक नए मसअले से निकले हैं
ये जो कुछ रास्ते से निकले हैं

काग़ज़ी हैं ये जितने पैराहन
एक ही सिलसिले से निकले हैं

ले उड़ा है तिरा ख़याल हमें
और हम क़ाफ़िले से निकले हैं

याद रहते हैं अब जो काम हमें
ये उसे भूलने से निकले हैं
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Kaami Shah
हर एक गाम पे रंज-ए-सफ़र उठाते हुए
मैं आ पड़ा हूँ यहाँ तुझ से दूर जाते हुए

अजीब आग थी जिस ने मुझे फ़रोग़ दिया
इक इंतिज़ार में रक्खे दिए जलाते हुए

तवील रात से होता है बरसर-ए-पैकार
सो चाक तेज़ हुआ है मुझे बनाते हुए

ये तेज़-गामी-ए-सहरा अलग मिज़ाज की है
जो मुझ से भाग रही है क़रीब आते हुए

है एक शोर-ए-गुज़िश्ता मिरे तआक़ुब में
मैं सुन रहा हूँ जिसे अपने पार आते हुए

शरीक-ए-आतिश ओ आब-ओ-हवा ओ ख़ाक रहे
मिरे अनासिर-ए-तरतीब शक्ल पाते हुए

बहुत क़रीब से गुज़री है वो नवा-ए-सफ़ेद
मिरे हवास का नीला धुआँ उड़ाते हुए

मैं इम्तिज़ाज-ए-क़दीम-ओ-जदीद हूँ 'कामी'
सो इस्म-ए-अस्र ही पढ़ना मुझे बुलाते हुए
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