Khwaja Shauq

Khwaja Shauq

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Khwaja Shauq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Khwaja Shauq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़माना आश्ना है सिर्फ़ अश्कों के तलातुम से वो तूफ़ाँ और हैं जो दीदा-ए-बे-नम से गुज़रे हैं — Khwaja Shauq
फिर रहे हैं सभी चेहरों पे नक़ाबें डाले किस को हालात का आईना दिखाया जाए — Khwaja Shauq

Ghazal

लाला-ओ-गुल का लहू लाख बहाएा जाए ये चमन छोड़ के हम से तो न जाया जाए फिर रहे हैं सभी चेहरों पे नक़ाबें डाले किस को हालात का आईना दिखाया जाए रंग पर जश्न-ए-बहाराँ जभी आ सकता है फूल काँटों में कोई फ़र्क़ न पाया जाए अपनी तहज़ीब ही इख़्लास-ओ-रवादारी है इस को हटने से ब-हर-हाल बचाया जाए सब बराबर के हैं हक़दार चमन-साज़ी में फिर किसे हर्फ़-ए-ग़लत कह के मिटाया जाए ख़ुद-ब-ख़ुद क़ौम की तक़दीर सँवर जाएगी पहले बिगड़ा हुआ माहौल बनाया जाए जी रहे हैं सभी एहसास कुचल कर अपना अब किसे दर्द का एहसास दिलाया जाए सिर्फ़ हम उठ गए ऊपर तो कोई शान नहीं शान तो ये है कि गिरतों को उठाया जाए ख़ून बस्ता है तमन्नाओं का आँखें क्या हैं कौन सा ख़्वाब निगाहों में बसाया जाए आदमियत के चराग़ों की लवें तेज़ करो न हो ऐसा कि बदन छोड़ के साया जाए मंज़िलें ऐसी भी हैं फ़िक्र-ए-बशर से आगे जिन की हद में न इशारा न किनाया जाए 'शौक़' दिल नाम तो है एक चमन ज़ख़्मों का सिलसिला इस का मगर किस से मिलाया जाए — Khwaja Shauq
एक बे-हासिल तलब बे-नाम इक मंज़िल बना टूटने के बा'द ही दिल दर-हक़ीक़त दिल बना मंज़िलें ही क्या नया हर जादा-ए-मंज़िल बना लेकिन अपने आप को पहले किसी क़ाबिल बना हम फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू खा कर भी आगे बढ़ गए कम-निगाहों के लिए हर मरहला मुश्किल बना किस क़दर अहद-आफ़रीं आलम है तेरी ज़ात का जो तेरी महफ़िल में आया वो ख़ुद इक महफ़िल बना ग़म से ना-मानूस रहने तक थीं सारी तल्ख़ियाँ रफ़्ता रफ़्ता ग़म ही अपनी उम्र का हासिल बना पी गए कितने ही आँसू हम ब-नाम-ए-ज़िंदगी एक मुद्दत में कहीं दिल दर्द के क़ाबिल बना जज़्बा-ए-मंज़िल सलामत रास्तों की क्या कमी हम जिधर निकले नया इक जादा-ए-मंज़िल बना हर मक़ाम-ए-ज़िंदगी पर था मेरा आलम जुदा मैं कहीं तूफ़ाँ कहीं कश्ती कहीं साहिल बना तब्सिरे करने लगे हैं लोग हस्ब-ए-हौसला 'शौक़' आसानी से मैं कुछ और भी मुश्किल बना — Khwaja Shauq
आगही मौत से कम भी नहीं रुस्वा भी नहीं देखता हूँ वो तमाशा जो तमाशा भी नहीं जल्वा मुश्ताक़ भी हूँ जल्वा तक़ाज़ा भी नहीं हुस्न मजरूह-ए-नज़र हो ये गवारा भी नहीं ज़िंदगी हम को बहुत देर में रास आई है दर्द कम भी नहीं इम्कान-ए-मुदावा भी नहीं राह पाता है ज़माना मेरी गुमराही से मंज़िलें क्या मेरे आगे कोई रस्ता भी नहीं बाज़ वक़्तों के ख़यालात भी क्या होते हैं दूर तक जैसे मैं तन्हा भी हूँ तन्हा भी नहीं साबिक़ा ऐसे सितमगर से है दिन रात अपना या'नी क़ातिल भी नहीं वो तो मसीहा भी नहीं रौशनी मिलती है दुनिया को उन्हीं लोगों से जिन के हिस्से में चराग़ों का उजाला भी नहीं अपने ही शहर में अब अपने शनासा कम हैं दश्त-ए-ग़ुर्बत में अजब क्या जो शनासा भी नहीं हर तबाही का सबब है दिल-ए-मुज़्तर तन्हा ग़म हज़ार आफ़त-ए-जाँ है मगर इतना भी नहीं हक़ रिफ़ाक़त का अदा कर दिया शायद उस ने दिल गुलिस्ताँ भी नहीं दर्द का सहरा भी नहीं मशवरे देते हैं अहबाब मुझे 'शौक़' ऐसे जैसे अब तक मुझे अंदाज़ा ख़ुद अपना भी नहीं — Khwaja Shauq