Nadeem ahmad

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@nadeem-ahmad

Nadeem ahmad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nadeem ahmad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
पाने की तरह का न तो खोने की तरह का
होना भी यहाँ पर है न होने की तरह का

मालूम नहीं नींद किसे कहते हैं लेकिन
करता तो हूँ इक काम मैं सोने की तरह का

हँसने की तरह का कोई मौसम मिरे बाहर
मंज़र मिरे अंदर कोई रोने की तरह का

ऐसी कोई हालत है कि मुद्दत से बदन को
इक मरहला दरपेश है ढोने की तरह का

पहले की तरह आदमी मिलता तो है लेकिन
आधे की तरह का कभी पौने की तरह का
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Nadeem ahmad
जहाँ पे होता हूँ अक्सर वहाँ नहीं होता
वहीं तलाश करो मैं जहाँ नहीं होता

अगर तुम्हारी ज़बाँ से बयाँ नहीं होता
मिरा वजूद कभी दास्ताँ नहीं होता

बिछड़ गया था वो मिलने से पेश-तर वर्ना
मैं इस तरह से कभी राएगाँ नहीं होता

नज़र बचा के निकलना तो चाहता हूँ मगर
वो किस जगह से है ग़ाएब कहाँ नहीं होता

कभी तो यूँ कि मकाँ के मकीं नहीं होते
कभी कभी तो मकीं का मकाँ नहीं होता
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Nadeem ahmad
रुकना पड़ेगा और भी चलने के नाम पर
गिरती रहेगी ख़ल्क़ सँभलने के नाम पर

फँसता गया हूँ और निकलने की सई में
आफ़त मज़ीद आई है टलने के नाम पर

ये क्या तिलिस्म है कि उभरने के शौक़ में
आवाज़ दब गई है निकलने के नाम पर

दिल का शजर तो और भी पलने की आड़ में
मुरझा गया है फूलने-फलने के नाम पर

वो जा चुका है और बदन के नवाह में
अब जम रही है बर्फ़ पिघलने के नाम पर

बदलेगा कोई रोज़ नए-पन के शौक़ में
यकसाँ रहेगा कोई बदलने के नाम पर

मअ'नी का सब्ज़ा-गाह नज़र आ गया तो फिर
भड़केगा लफ़्ज़ शेर में ढलने के नाम पर
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Nadeem ahmad
एक तो काविश-ए-जिगर भी करूँ
और फिर मिन्नत-ए-समर भी करूँ

इश्क़ में ख़ैर था जुनूँ लाज़िम
अब कोई दूसरा हुनर भी करूँ

सोचता हूँ तिरे तआक़ुब में
ख़ुद को रुस्वा-ए-बाल-ओ-पर भी करूँ

पहले बिन-माँगे ज़िंदगी दे दी
और फिर शर्त है बसर भी करूँ

शेर लिक्खूँ भी और लोगों में
शायरी अपनी मुश्तहर भी करूँ

लफ़्ज़ ओ मअ'नी का जब्र झेलूँ भी
और फिर ख़ुद को मो'तबर भी करूँ

काम कुछ बे-सबब भी कर डालूँ
और कुछ काम सोच कर भी करूँ
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Nadeem ahmad
मिरी नज़र को दर-ओ-बाम पर लगाया हुआ है
चलो किसी ने मुझे काम पर लगाया हुआ है

वो और होंगे जो सहरा में पा-ब-जौलाँ हैं
मुझे तो शहर ने अहकाम पर लगाया हुआ है

अगर वो आया तो इस बार सुब्ह मानूँगा
बहुत दिनों से मुझे शाम पर लगाया हुआ है

कभी तो लगता है ये उज़्र-ए-लंग है वर्ना
मुझे तो कुफ़्र ने इस्लाम पर लगाया हुआ है

वो और लोग हैं जो उस के पास बैठे हैं
हमें तो उस ने किसी काम पर लगाया हुआ है
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Nadeem ahmad
याद पड़ता तो नहीं कब मिरा देखा हुआ है
ऐसा लगता है कि ये सब मिरा देखा हुआ है

और उस बुत की परस्तिश में नया कुछ भी नहीं
और क्यूँ देखूँ उसे जब मिरा देखा हुआ है

मौत कुछ मेरे लिए लाए तो लाए शायद
ज़िंदगी का तो सभी ढब मिरा देखा हुआ है

इस दफ़ा इश्क़ के जंगल से निकल आऊँगा
राह का सारा फ़ुसूँ अब मिरा देखा हुआ है

किस तरह हुस्न को लफ़्ज़ों में मुक़फ़्फ़ल कर दूँ
किस तरह कह दूँ मिरा रब मिरा देखा हुआ है
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Nadeem ahmad
मुँह-अँधेरे ही कोई घर से निकलता हुआ था
एक मंज़र था कि मंज़र से निकलता हुआ था

एक ख़िल्क़त कि न होने में फँसी जाती थी
और मैं होने के चक्कर से निकलता हुआ था

कुछ तो वो ख़ुद ही चला आया था बाहर बाहर
और कुछ मैं भी अब अंदर से निकलता हुआ था

ख़ूब रौशन सी कोई चीज़ मिरे सामने थी
और धुआँ था कि मिरे सर से निकलता हुआ था

मुद्दतों यूँ ही तह-ए-बाल चले आते थे
आसमाँ था कि मिरे पर से निकलता हुआ था
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Nadeem ahmad
ख़ाक अतराफ़ में उड़ती है बहुत पानी दे
इस मसाफ़त को भी एक ख़ित्ता-ए-बारानी दे

कुछ दिनों दश्त भी आबाद हुआ चाहता है
कुछ दिनों के लिए अब शहर को वीरानी दे

या मुझे मम्लिकत-ए-इश्क़ की शाही से नवाज़
या मुझे फिर से वही बे-सर-ओ-सामानी दे

मेरी दानाई ने रक्खा न कहीं का मुझ को
मेरे मौला तू मुझे फिर वही नादानी दे

अब कहानी को भी उलझा ज़रा अफ़्साना-तराज़
शौक़ कुछ और बढ़ा आँख को हैरानी दे
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