R P Shokh

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R P Shokh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in R P Shokh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
उस ने पूछा तो फ़क़त दर्द का अफ़्साना खुला
किसी सूरत भी न राज़-ए-दिल-ए-दीवाना खुला

हर-नफ़स पा-ए-जुनूँ के लिए ज़ंजीर-ए-गिराँ
कू-ब-कू फिरता रहा फिर भी ये दीवाना खुला

जल के मरते हैं प इज़हार के शो'लों में नहीं
हादिसा यूँ भी हुआ शम्अ' से परवाना खुला

हिज्र की रात ढली सुब्ह के साग़र में मगर
नींद आई न तिरी दीद का मय-ख़ाना खुला
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नक़्श दीवार-ए-शिकस्ता ही कहीं हो मुझ में
दर्द हो याद हो कोई तो मकीं हो मुझ में

इक जज़ीरा हूँ तह-ए-ख़ून-ए-तमन्ना कब से
पाँव रखने के लिए कुछ तो ज़मीं हो मुझ में

ख़ून बाक़ी है तो फिर ज़ख़्म से बाहर आए
रंग दिखलाए जो इक बूँद यक़ीं हो मुझ में

मैं तिरे ग़म की अमानत को सँभाले रक्खूँ
साँस कोई तो मगर मेरा अमीं हो मुझ में

मुझ सुलगते हुए जंगल पे है चढ़ती आँधी
लौट जाए जो भी अब गोशा-नशीं हो मुझ में
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दिल की बातें हैं ये बोझल न बनाऊँ उस को
मस्लहत ये है कि कुछ भी न बताऊँ उस को

शहर में जा के कहूँ किस से बुरा हाल अपना
कोई अपना हो तो अहवाल सुनाऊँ उस को

आ बसीं दिल में भी रोज़ी की तमन्नाएँ अब
अब कहाँ जाऊँ कि दुनिया से छुपाऊँ उस को

हर गली कूचा-ए-क़ातिल है दिल-ए-ईज़ा-तलब
कोई मुश्किल हो तो आसान बनाऊँ उस को

लम्स मुमकिन नहीं शो'ले का बिना ख़ाक हुए
फूल हो सिर्फ़ तो सीने से लगाऊँ उस को
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ग़म तो ये भी है कि तक़दीर भी रोई बरसों
हाए वो ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर भी रोई बरसों

दिल किसी साअ'त-ए-गिर्यां का नविश्ता जिस की
हुई तफ़्सीर तो तफ़्सीर भी रोई बरसों

आबदीदा भी था मैं नक़्श ब-दीवार भी था
मुझ को देखो कि ये तस्वीर भी रोई बरसों

उस को भी करना पड़ी दश्त-नवर्दी क्या क्या
पाँव पड़ कर मिरे ज़ंजीर भी रोई बरसों
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आ गए तुम तो जफ़ाओं का क़लक़ याद नहीं
दिल वो बच्चा है जिसे पहला सबक़ याद नहीं

क्या बताएँ कि थी क्या सुब्ह-ए-अज़ल वो सूरत
इस कड़ी धूप में आरिज़ की शफ़क़ याद नहीं

जाने किस गाम खुलें उस के तबस्सुम के रुमूज़
आ चुके कितने ही नैरंग उफ़ुक़ याद हैं

उम्र-ए-रफ़्ता में तिरा नाम भी लिक्खा था कहीं
ले गया कौन उड़ा कर वो वरक़ याद नहीं

जब्र-ए-दुनिया में वो कॉलेज का ज़माना भूला
थे किताबों में लिखे कौन से हक़ याद नहीं

जंग से मसअले हल करने चले हो लोगो
तुम्हें तारीख़ का एक एक सबक़ याद नहीं
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जो न गुलशन न गुलाबों से निकल कर आए
वो तो ख़ुशबू है जो ख़्वाबों से निकल कर आए

इतनी रंगीं तो नहीं होती क़बा क्या होगा
गर मिरा चाँद सहाबों से निकल कर आए

ग़म के तारे भी बुझे जाते हैं उस से कह दो
सूरत-ए-सुब्ह हिजाबों से निकल कर आए

ज़िंदगी अब तो तिरा शहर-ए-हक़ाएक़ ये कहे
कोई सहरा न सराबों से निकल कर आए

कभी वो भी तो सना-ख़्वाँ हो कि जिस की ख़ातिर
इतने खूँ-रेज़ अज़ाबों से निकल कर आए

जब कोई लफ़्ज़ तिरे प्यार के क़ाबिल न मिला
कोई मा'नी न किताबों से निकल कर आए
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ये हसरतों की मिरी ख़ाक से नुमू क्या है
तिरे बग़ैर ये दुनिया-ए-रंग-ओ-बू क्या है

तू यूँ भी साथ मिरे जाँ-ब-लब जुदाई में
वगर्ना ये जिए जाने की आरज़ू क्या है

तुम्हारी याद से बढ़ कर करें इबादत क्या
बहे जब आँख से ख़ुद ही तो फिर वुज़ू क्या है

सँभल के यूँ वो नए हम-सफ़र के साथ चला
कभी न उस को बताया कि जुस्तुजू क्या है

मैं आज अपने मसीहा से कट के आया हूँ
मिरा इलाज बता मेरे चारा-जू क्या है

लहू तो वो कि बहे जब तो नक़्श-ए-यार बने
न अपना रंग जमाए तो फिर लहू क्या है
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बे-आब मौसमों का सामान कर के रोया
ये दिल कि आँख को भी वीरान कर के रोया

इस ख़ैर-ख़्वाह को भी ख़ुद ही तसल्लियाँ दूँ
किस किस दुआ का वो भी नुक़सान कर के रोया

सावन की ज़द में आए फिर क़हक़हे बसंती
तेरा ख़याल हम को हैरान कर के रोया

उस को पता नहीं था लाए थे पल की मोहलत
वो मेज़बान हम को मेहमान कर के रोया

ढूँडा फ़रार उस ने जब इक रफ़ीक़-ए-नौ में
वो अपनी मुश्किलों को आसान कर के रोया
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कभी होने से कभी दुख के न होने से हुआ
ऐ मोहब्बत तुझे बस काम ही रोने से हुआ

ख़ुद ही लौट आए तो लौट आए मिरे दीदा-ए-तर
कोई ज़ंजीर कहाँ अश्क पिरोने से हुआ

वो तो रहता है कहीं दिल के अंधेरे में मगर
मुझ पे रौशन हुआ जो कुछ उसी कोने से हुआ

उस का मम्नून हूँ अब जिस ने भँवर में छोड़ा
इतना गहरा भी तो मैं उस के डुबोने से हुआ
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वो नहीं बीच तो ये उम्र-ए-रवाँ कहती है
क्या चलूँ जब कोई मेहवर से अलैहदा कर दे

अब जो टूटा हूँ तो उस आँख का जादू समझा
वो तो चिंगारी भी पत्थर से अलैहदा कर दे

क्या कहूँ उस से बिछड़ने की अज़िय्यत क्या है
जैसे गर्दन ही कोई सर से अलैहदा कर दे

एक मुद्दत से ग़म-ए-दहर है अश्कों में घुला
आ के ये रेत समुंदर से अलैहदा कर दे

एक मज़लूम-ए-ज़माना हूँ मैं बद-बख़्त नहीं
ग़म-ए-दुनिया को मुक़द्दर से अलैहदा कर दे

तंग सहरा है जो अंदर ये तलब है उस की
दर-ओ-दीवार को अब घर से अलैहदा कर दे

उसे देखूँ कि मैं रंगों का वो मंज़र देखूँ
निगह-ए-शौक़ उसे मंज़र से अलैहदा कर दे
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दर्द बन कर भी दिल-ओ-जाँ में नहीं रह पाता
वो सँवरता है तो इम्काँ में नहीं रह पाता

फ़स्ल-ए-गुल झेल के यूँ जिस्म दरीदा तो न था
चाक भी अब तो गरेबाँ में नहीं रह पाता

हम्द कीजे भी तो क्या उस की कि है बर्क़-सिफ़त
दो घड़ी दीदा-ए-हैराँ में नहीं रह पाता

कुछ तो ग़म्ज़े भी हैं इस दुश्मन-ए-दीं के काफ़िर
कुछ ये दिल भी है कि ईमाँ में नहीं रह पाता

रोज़ी रोटी के सवालों में घिरा रहता हूँ
दिल में जो शख़्स है अरमाँ में नहीं रह पाता
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माथे पे पड़ी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हिला दी
क्यूँ तुम ने दिल-ए-ख़ुफ़्ता की ज़ंजीर हिला दी

वैसे तो मिरे इश्क़ का हर नक़्श हसीं था
जब दर्द ने खींची तो ये तस्वीर हिला दी

ख़त भेज दिया काट के पैमान-ए-मुलाक़ात
ये कौन है जिस ने तिरी तहरीर हिला दी

यूँ ही न समझ अहल-ए-मोहब्बत के जुनूँ को
कम-बख़्त ने जब चाहा है तक़दीर हिला दी

वो ज़लज़ला गो रोज़ हिला देता था दिल को
इस बार मगर सारी ही ता'मीर हिला दी
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था भुलाना जिन्हें फिर भी वही ग़म याद आए
हम मिले भी तो ज़माने के सितम याद आए

कार-ए-दुनिया में न शबनम है न अम्बर न गुलाब
दहर देखा तो तिरी ज़ुल्फ़ के ख़म याद आए

याद कर के तुम्हें रोने का ज़माना भी गया
आज रोया हूँ तो समझा हूँ कि तुम याद आए

भर के झीलों को चला जाता है सावन जैसे
इस तरह याद है वो शख़्स जो कम याद आए

ये तो सच है था मिरे लब के क़रीं और गुलाब
ये भी सच है मुझे उस वक़्त भी तुम याद आए
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मुश्किल में रहा वो भी कि तदबीर न था मैं
मैं ख़्वाब तो था उस का पे ता'बीर न था मैं

यूँ भी हुआ उस ने मुझे सज्दों से नवाज़ा
बद-बख़्ती से जिस शख़्स की तक़दीर न था मैं

वो छोड़ गया राह में ये उस की रज़ा थी
वैसे भी किसी पाँव में ज़ंजीर न था मैं

इस ज़ौक़-ए-सुख़न ने किया रुस्वा-ए-ज़माना
पहले तो तिरे राज़ की तश्हीर न था मैं

करता भी तो कैसे मिरी पहचान ज़माना
दुख ऐसा था ख़ुद अपनी भी तस्वीर न था मैं
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एहसास-ए-बे-ज़बाँ की लताफ़त इसी में थी
मैं ने कहा न कुछ कि मोहब्बत इसी में थी

ये शहर जिस में नाम कमाना मुहाल था
हम गुफ़्तुगू-ए-शहर थे शोहरत इसी में थी

वैसे तो दिल के टूटने का कुछ नहीं मलाल
लेकिन तिरे जमाल की सूरत इसी में थी

अच्छा हुआ कि देखने आया न वो हमें
चेहरे पे पत-झड़ों की भी इज़्ज़त इसी में थी

यारान-ए-कम-निगाह उसे देखते भी क्या
ये सादगी कि सारी क़यामत इसी में थी
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थी क़हर-ए-सादगी भी सँवरने से पेशतर
शह-रग पे नेश्तर था उतरने से पेशतर

फिरता हूँ दर-ब-दर मैं मगर मिस्ल-ए-बू-ए-गुल
मेरा भी था मक़ाम बिखरने से पेशतर

बे-अश्क क्या हुआ कि मैं बे-अक्स हो गया
आईना था ये पानी उतरने से पेशतर

हिजरत से पहले हिज्र के थे वसवसे मुझे
हर लम्हा हादिसा था गुज़रने से पेशतर

इस नज़-ए-इंतिज़ार को इक उम्र हो चली
कैसी हमेश्गी है ये मरने से पेशतर
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ये इत्तिफ़ाक़ था मैं उस का हम-ज़माना था
जो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ था ग़ाएबाना था

कहीं मिले तो कभी उम्र-ए-रफ़्ता से पूछूँ
कहाँ है आज तिरा जिस से दोस्ताना था

बना के अब मुझे ईंधन जलाए जाता है
यही थी शाख़ कभी जिस पे आशियाना था

कभी जो ज़ो'म हुआ वक़्त रह गया पीछे
नज़र उठाई तो देखा वही ज़माना था

कहाँ थी कोई समाअ'त मकीं वहाँ तो फ़क़त
जबीन-साई की ख़ातिर इक आस्ताना था

कभी ग़ज़ाल सी ख़ू-ए-गुरेज़ ही न गई
थी क़ुर्बतें तो बहुत एक शाख़साना था
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क्यूँ जू-ए-रवाँ आ के यूँ आँखों में खड़ी है
लगता है पहाड़ों पे कहीं बर्फ़ पड़ी है

ऐ दर्द कभी उठ भी सही तंगी-ए-दिल से
मुद्दत से दर-ए-दिल पे कोई याद खड़ी है

मंज़िल को चले या किसी मक़्तल को चले हैं
हर राह यूँ लगती है कि ज़ंजीर पड़ी है

यूँही तो नहीं बैठ गए झाड़ के दामन
महरूमी-ए-तक़दीर से उम्मीद बड़ी है

दो दिन की मोहब्बत ने दी ये हस्ती-ए-जावेद
इक पल भी नहीं कटती अभी उम्र पड़ी है

यूँ हम ने निकाली है तिरी राह-ए-मुलाक़ात
यूँ हिज्र तिरे दीद की बरकत की घड़ी है

हर सुब्ह तिरी चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ का ग़म्ज़ा
हर शाम तिरे लब से हँसी फूट पड़ी है

दिन है तो है महका तिरे रुख़्सार का ग़ाज़ा
शब है तो तिरी माँग सितारों से जड़ी है
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कम कभी राह के आज़ार तो होते होंगे
आबला-पाई कहीं ख़ार तो होते होंगे

मुझ से ये सोच के वो मेरा पता पूछे था
तंग-दस्तों के भी घर-बार तो होते होंगे

उस से बिछड़ा मैं अँधेरों का मकीं हूँ वर्ना
कोई घर हो दर-ओ-दीवार तो होते होंगे

वो जहाँ भी हो उसे देख के इस शहर के लोग
कू-ब-कू नक़्श-ब-दीवार तो होते होंगे

मर्ग जो अपनी तरह कोई वहाँ हो कि न हो
लोग उसे देख के बीमार तो होते होंगे

बे-गुनह भी था निहत्था भी था मैं ऐ क़ातिल
क़त्ल करने के भी मेयार तो होते होंगे
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ज़िंदगी अपनी हुई यार की फ़ितरत की तरह
हम भी कल हों कि न हों उस की इनायत की तरह

वक़्त हम को ये बुरे दिन न दिखाता ऐ काश
हम भी उठ जाते ज़माने से मोहब्बत की तरह

हम तो हर लम्हे को देते रहे साँसों का हिसाब
हम पे टूटा है हर इक लम्हा क़यामत की तरह

गुल खिलाएगा ये मक़्तूल-लहू धरती पर
किसी रुख़्सार पे चढ़ती हुई रंगत की तरह

लोग कहते हैं न क्यों भूल गया मैं उस को
वो कि था जो मिरी बुनियादी ज़रूरत की तरह

ज़िंदगी तो किसी साग़र में ढली तो होती
हम तो पी लेते तुझे जाम-ए-शहादत की तरह
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