Raees Warsi

Raees Warsi

@raees-warsi

Raees Warsi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Raees Warsi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
तेरे पैकर सी कोई मूरत बना ली जाएगी
दिल के बहलाने की ये सूरत निकाली जाएगी

कौन कह सकता था ये क़ौस-ए-क़ुज़ह को देख कर
एक ही आँचल में ये रंगत समा ली जाएगी

काग़ज़ी फूलों से जब मानूस होंगी तितलियाँ
आशिक़ी की रस्म दुनिया से उठा ली जाएगी

आइने में बाल पड़ जाए तो जा सकता नहीं
रेत की दीवार तो फिर से बना ली जाएगी

हम जो कार-ए-आज़री में बे-हुनर ठहरे तो क्या
उन की सूरत शे'र के क़ालिब में ढाली जाएगी

ख़ुद-परस्ती के नशे में जिन को है ज़ो'म-ए-जमाल
आइना देखें तो उन की ख़ुश-ख़याली जाएगी

इश्क़ की फ़ितरत में है परवान ही चढ़ना 'रईस'
हुस्न वो दौलत नहीं जो फिर कमा ली जाएगी
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Raees Warsi
अब तो जो मंज़र-ए-शादाब नज़र आता है
ऐसा लगता है कोई ख़्वाब नज़र आता है

इस हसीं शहर में हर सम्त है लोगों का हुजूम
और इंसाँ है कि नायाब नज़र आता है

कब तलक जिंस-ए-वफ़ा शहर में अर्ज़ां होगी
अब ये दरिया भी तो पायाब नज़र आता है

गर्दिश-ए-वक़्त ने ऐसे भी तराशे हैं सराब
दश्त-ए-बे-आब में गिर्दाब नज़र आता है

होने लगता है तिरे क़ुर्ब का एहसास मुझे
चौदहवीं शब को जो महताब नज़र आता है

तेरी अंगुश्त-ए-हिनाई का जिसे लम्स मिले
वो नगीना बड़ा ख़ुश-आब नज़र आता है

उस की ख़ुशबू से मोअ'त्तर मिरा आँगन है 'रईस'
जागती आँख से ये ख़्वाब नज़र आता है
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Raees Warsi
ख़ुद-आगही का अजब रोग लग गया है मुझे
कि अपनी ज़ात पे धोका तिरा हुआ है मुझे

पुकारती है हवाओं की नग़्मगी तुझ को
सुकूत झील का आवाज़ दे रहा है मुझे

अजीब ज़ौक़-ए-मोहब्बत अता किया तू ने
वजूद-ए-संग भी तहज़ीब-ए-आईना है मुझे

मैं अपने नाम से ना-आश्ना सही लेकिन
तुम्हारे नाम से हर शख़्स जानता है मुझे

मैं अपने घर के दिए भी भुलाए बैठा हूँ
तिरे ख़याल ने ये हौसला दिया है मुझे

कहाँ ये फ़ुर्सत-ए-काविश कि तुझ को याद करूँ
शुऊर-ए-ज़ात का दरपेश मरहला है मुझे

'रईस' शेर की दुनिया से क्या ग़रज़ मुझ को
किसी की याद ने शाइ'र बना दिया है मुझे
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Raees Warsi
ये मरहले भी मोहब्बत के बाब में आए
बिछड़ गए थे जो हम से वो ख़्वाब में आए

वो जिस की राह में हम ने बिछाए ग़ुंचा-ओ-गुल
उसी मकान से पत्थर जवाब में आए

न जिस को दस्त-ए-हिनाई का तेरे लम्स मिले
कहाँ से बू-ए-वफ़ा उस गुलाब में आए

तुम्हारे हुस्न-ए-नज़र से हैं मो'तबर हम भी
जो हम किसी निगह-ए-इंतिख़ाब में आए

अगरचे मिस्ल है आब-ए-रवाँ के रेग-ए-सराब
कहाँ से शोरिश-ए-दरिया सराब में आए

तिरे ख़याल का पैकर सजा है सीने में
हम इस तरह तिरी चश्म-ए-ख़ुश-आब में आए

हवा के दोश पे उस ने लिखा है नाम-ए-'रईस'
ये सुन के लोग बहुत पेच-ओ-ताब में आए
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Raees Warsi
आवारा बू-ए-गुल की तरह हैं चमन से दूर
लग़ज़ीदा-पा नहीं हैं मगर हम वतन से दूर

तारीक रास्तों में बिछाते हैं रौशनी
ऐसे भी कुछ चराग़ जले अंजुमन से दूर

जिस ने नसीम-ए-सुब्ह को बख़्शी है ताज़गी
ख़ुशबू वो किस क़दर है परेशाँ चमन से दूर

वो लोग जिन का ख़ून है रंग-ए-बहार में
रक्खा गया है उन को ही सेहन-ए-चमन से दूर

संग-ए-असास होने के एहसास ने हमें
अब तक रखा है लज़्ज़त-ए-तश्हीर-ए-फ़न से दूर

अब उस को क्या कहें वही फ़नकार-ए-वक़्त है
जो शख़्स अस्र-ए-नौ में है मेयार-ए-फ़न से दूर
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Raees Warsi
जुब्बा किसी का और न दस्तार देखना
है कौन मुफ़लिसों का तरफ़-दार देखना

तर्ज़-ए-सुख़न न शोख़ी-ए-गुफ़्तार देखना
इंसानियत का कौन है ग़म-ख़्वार देखना

ये अरसा-ए-हयात भी सूरज की ज़द पे है
लम्हों के बा'द साया-ए-दीवार देखना

हर ज़ाद ये हयात का मेरी नज़र में है
मेरा सफ़र है सूरत-ए-परकार देखना

दीवार-ओ-दर पे कैसी मुसल्लत है ख़ामुशी
नैरंगी-ए-ज़रीया-ए-इज़हार देखना

जो दर्स दे रहे हैं फ़रोग़-ए-किताब का
कितने वही हैं इल्म से बेज़ार देखना

मंशूर जिस का उस्वा-ए-शब्बीर हो 'रईस'
ऐसा है कौन साहब-ए-किरदार देखना
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Raees Warsi
जो आ सको तो बताओ कि इंतिज़ार करें
वगर्ना अपने मुक़द्दर पे ए'तिबार करें

चराग़-ए-ख़ाना-ए-उम्मीद है अभी रौशन
अभी न तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ को इख़्तियार करें

हमारे तूल-ए-मसाफ़त का ये तक़ाज़ा है
शरीक-ए-हाल तुझे ऐ ख़याल-ए-यार करें

ये गुल-रुख़ों का है शेवा ब-नाम-ए-नाज़-ओ-अदा
निगाह-ए-आशिक़-ए-बिस्मिल को अश्क-बार करें

ये अहल-ए-इश्क़ को ज़ेबा नहीं सर-ए-बाज़ार
जुनूँ के नाम पे दामाँ को तार तार करें

हमारे आबा-ओ-अज्दाद का ये विर्सा है
ज़मीन-ए-दश्त को सर्माया-ए-बहार करें

जवाज़-ए-ज़िंदगी ठहरी है जिस की याद 'रईस'
उसी से दिल के तअल्लुक़ को उस्तुवार करें
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Raees Warsi
उसे भुला के भी यादों के सिलसिले न गए
दिल-ए-तबाह तिरे उस से राब्ते न गए

किताब-ए-ज़ीस्त के उनवाँ बदल गए लेकिन
निसाब-ए-जाँ से कभी उस के तज़्किरे न गए

मुझे तो अपनी ही सादा-दिली ने लूटा है
कि मेरे दिल से मुरव्वत के हौसले न गए

मैं चाँद और सितारों के गीत गाता रहा
मिरे ही घर से अँधेरों के क़ाफ़िले न गए

'रईस' जुरअत-ए-इज़हार मेरा विर्सा है
क़सीदे मुझ से किसी शाह के लिखे न गए
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Raees Warsi
जो देखो तो वो चेहरा अजनबी है
अगर सोचो तो वज्ह-ए-ज़िंदगी है

मुझे है ए'तिराफ़-ए-जुर्म-ए-उल्फ़त
मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है

मिरी आँखें लुटाती हैं जो गौहर
मिज़ाज-ए-इश्क़ में दरिया-दिली है

मसीहाई न तुम से हो सकेगी
हमारा दर्द-ए-उल्फ़त दाइमी है

तिरा पैकर ख़यालों में बसा है
हर इक सू रौशनी ही रौशनी है

हमें रास आ गई ख़ूबाँ-परस्ती
बड़ी दिलकश हमारी ज़िंदगी है

तिरी चाहत का है ये भी करिश्मा
अदू से भी हमारी दोस्ती है

मुझे मय-कश समझता है ज़माना
निगाहों में ख़ुमार-ए-आशिक़ी है

मज़ा जब है वो कह दे बे-ख़ुदी में
क़रार-ए-जाँ 'रईस'-ए-वारसी है
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Raees Warsi
मैं एक काँच का पैकर वो शख़्स पत्थर था
सो पाश पाश तो होना मिरा मुक़द्दर था

तमाम रात सहर की दुआएँ माँगी थीं
खुली जो आँख तो सूरज हमारे सर पर था

चराग़-ए-राह-ए-मोहब्बत ही बन गए होते
तमाम उम्र का जलना अगर मुक़द्दर था

फ़सील-ए-शहर पे कितने चराग़ थे रौशन
सियाह रात का पहरा दिलों के अंदर था

अगरचे ख़ाना-बदोशी है ख़ुशबुओं का मिज़ाज
मिरा मकान तो कल रात भी मोअत्तर था

समुंदरों के सफ़र में वो प्यास का आलम
कि फ़र्श-ए-आब पे इक कर्बला का मंज़र था

इसी सबब तो बढ़ा ए'तिबार-ए-लग़्ज़िश-ए-पा
हमारा जोश-ए-जुनूँ आगही का रहबर था

जो माहताब हिसार-ए-शब-ए-सियाह में है
कभी वो रात के सीने पे मिस्ल-ए-ख़ंजर था

मैं उस ज़मीं के लिए फूल चुन रहा हूँ 'रईस'
मिरा नसीब जहाँ बे-अमाँ समुंदर था
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Raees Warsi
इक लम्हा-ए-विसाल था वापस न आ सका
वो वक़्त की मिसाल था वापस न आ सका

हर इक को अपना हाल सुनाने से फ़ाएदा
मेरा जो हम-ख़याल था वापस न आ सका

शायद मिरे फ़िराक़ में घर से चला था वो
ज़ख़्मों से पाएमाल था वापस न आ सका

शायद हुजूम-ए-सदमा-ए-फ़ुर्क़त के घाव से
वो इस क़दर निढाल था वापस न आ सका

शायद मैं उस को देख के सब को भुला ही दूँ
उस को ये एहतिमाल था वापस न आ सका

कितने ख़याल रूप हक़ीक़त का पा गए
जो मरकज़-ए-ख़याल था वापस न आ सका

मुझ को मिरे वजूद से जो कर गया जुदा
कैसा वो बा-कमाल था वापस न आ सका

हर दम 'रईस' वो तो नज़र के है सामने
तेरा तो ये ख़याल था वापस न आ सका
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Raees Warsi