Saba Jayasi

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@saba-jayasi

Saba Jayasi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saba Jayasi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
बू-ए-ख़ुश की तरह हर सम्त बिखर जाऊँगा
आहनी हाथों से अब कोई दबा दे मुझ को

मैं तो मुद्दत से चला आता हूँ पीछे पीछे
गर्दिश-ए-वक़्त कभी रुक के सदा दे मुझ को

दिन तो सारा ही कटा मिस्ल-ए-चराग़-ए-कुश्ता
गर्मी-ए-जिस्म सर-ए-शाम जला दे मुझ को

तुम मुझे देख के जो बात कभी कह न सके
क्या ये मुमकिन नहीं आईना बता दे मुझ को

जिन को पाने से हक़ीक़त भी फ़साना बन जाए
अब 'सबा' ऐसे सराबों का पता दे मुझ को
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Saba Jayasi
और किस तरह उसे कोई क़बा दी जाए
एक तस्वीर ही पत्थर पे बना दी जाए

ताकि फिर कोई न परछाईं के पीछे दौड़े
अपनी बस्ती में चलो आग लगा दी जाए

ख़ूब है ये मिरी मख़्सूस तबीअ'त का इलाज
हर तमन्ना मिरी काँटों पे सुला दी जाए

अपनी ही ज़ात पे होता है जो साए का गुमाँ
तीरगी शब की किसी तौर बढ़ा दी जाए

हम किसी तरह तो इमरोज़ की तल्ख़ी समझें
अहद-ए-रफ़्ता की हर इक बात भुला दी जाए

आओ देखें न कोई अपना शनासा निकले
अजनबी चेहरों से ये गर्द हटा दी जाए

देखने से जिसे आँखों में अँधेरा छाया
किस को इस ख़्वाब की ता'बीर बता दी जाए

जब मुक़द्दर है शब-ओ-रोज़ की बे-कैफ़ी 'सबा'
ख़्वाब की तरह हर इक याद भुला दी जाए
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Saba Jayasi
हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली
क़िस्सा-ए-दर्द छिड़ा बात से फिर बात चली

किस तरह समझूँ मिरा इश्क़ है सरगर्म-ए-सफ़र
राह बेदार हुई है न कहीं शम्अ' जली

दिल को बहलाएँ कि क़दमों को सँभालें हम लोग
जब नए मोड़ पे पहुँचे हैं तो ये शाम ढली

ये मिरे नक़्श-ए-क़दम वक़्त से मिट सकते हैं
अपने सीने से लगाए है जिन्हें तेरी गली

हम ने हर तार-ए-गरेबाँ को बनाया दामन
तेरी यादों को लिए बाद-ए-बहारी जो चली

मुझ को इस बर्क़ से बस इतना ही शिकवा है 'सबा'
आशियाँ जल गया क्यूँ शाख़-ए-नशेमन न जली
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हो गई सारी पशेमानी अबस
अपनी हस्ती हम ने पहचानी अबस

अब निकलता ही नहीं सूरत से अक्स
दिल की ये आईना-सामानी अबस

आँख पत्थर की तरह साकित हो जब
क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ की ये जौलानी अबस

ज़िंदगी है रेग-ज़ार-ए-बे-कराँ
दीदा-ए-बेताब तुग़्यानी अबस

मिलने पर हैरान होना था 'सबा'
छूट कर उन से ये हैरानी अबस
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आज गुज़रे हुए लम्हों को पुकारा जाए
दिल को फिर ख़ून-ए-तमन्ना से सँवारा जाए

मेरा हर शौक़ भी हो उन का हर अंदाज़ भी हो
दिल में अब नक़्श कोई ऐसा उतारा जाए

जब थकी-मांदी पड़ी सोती हो हर शोरिश-ए-ग़म
हिज्र की रात को किस तरह गुज़ारा जाए

कुछ हो मे'यार-ए-ख़िरद चाक-ए-क़बा ऐब सही
चश्म-ए-मा'सूम का ख़ाली न इशारा जाए

आबला-पा है तो क्या है तू वो सरगर्म-ए-सफ़र
क़ाफ़िले वालो 'सबा' को तो पुकारा जाए
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