Sabir Afaqi

Sabir Afaqi

@sabir-afaqi

Sabir Afaqi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sabir Afaqi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
किसी ज़ालिम की जीते-जी सना-ख़्वानी नहीं होगी
कि दाना हो के मुझ से ऐसी नादानी नहीं होगी

दिल-ए-आबाद का सा कोई शहर आबाद क्या होगा
दिल-ए-वीरान की सी कोई वीरानी कहाँ होगी

अदू से क्या गिला करना कि वो मा'ज़ूर लगता है
हमारी क़द्र-ओ-क़ीमत उस ने पहचानी नहीं होगी

नुजूमी में नहीं लेकिन ये अंदाज़े से कहता हूँ
मोहब्बत तो रहेगी पर ये अर्ज़ानी नहीं होगी

इलाज-ए-अस्ल है इक आज़मूदा नुस्ख़ा दुनिया में
परेशाँ तुम रहोगे तो परेशानी नहीं होगी

खुला दरवाज़ा रख छोड़ा है जब जी चाहे आ जाना
अजी अब हम से अपने घर की दरबानी नहीं होगी

न तुम आए तो 'साबिर' क्या मज़ा आएगा महफ़िल में
ग़ज़ल-ख़्वानी तो होगी पर गुल-अफ़्शानी नहीं होगी
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Sabir Afaqi
जो बू-ए-ज़िंदगी मुझे किरन किरन से आई है
हक़ीक़तन वो आप ही के पैरहन से आई है

हमारे जिस्म ओ रूह को सुरूर दे गई वही
नसीम-ए-ख़ुश-गवार जो तिरे बदन से आई है

ये कौन शख़्स मर गया ये किस का है कफ़न कहो?
कि ज़िंदगी की बू मुझे इसी कफ़न से आई है

तरीक़त-ए-नबर्द में हमारा सिलसिला है और!
ये ख़ुद-कुशी की रस्म-ए-बद तो कोहकन से आई है

कली तो फिर कली हुई महक उठे हैं ख़ार भी
मैं जानता हूँ ये नसीम किस चमन से आई है

खुले रखे हैं मैं ने सारे रंग-ओ-बू के रास्ते
मिरे चमन की ये फबन चमन चमन से आई है

मैं 'साबिर'-ए-सुख़न-तराज़ क्यूँ किसी को दोश दूँ
कि मेरे सर पे हर बला मिरे सुख़न से आई है
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Sabir Afaqi
न किसी में नज़र आई ये करामत मुझ को
वर्ना क्यों सौंपते दुनिया की इमामत मुझ को

एक मुद्दत से मुझे ढूँड रहे थे अहबाब
अब मिला हूँ तो न छोड़ेंगे सलामत मुझ को

तू अगर मेरा ख़ुदा है तो मिरे पास भी आ
दूर अफ़्लाक से दे और सदा मत मुझ को

इन अज़ाबों से बड़ा और कहाँ कोई अज़ाब
सहल लगता है बहुत ख़ौफ़-ए-क़यामत मुझ को

रोज़ धरती वही देखूँ वही गर्दूं देखूँ
ज़हर लगती है ये आलम की क़दामत मुझ को

जाने क्यों बैठने देता नहीं 'साबिर' हरगिज़
एक बे-नाम सा एहसास-ए-नदामत मुझ को
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Sabir Afaqi
तख़्लीक़ का अंदाज़ निकाल और तरह का
पेङ़ा कोई अब चाक पे डाल और तरह का

दिल होंगे दिलों में कोई धड़कन नहीं होगी
इंसान पे आना है ज़वाल और तरह का

अफ़्लाक की मशअ'ल से अंधेरे न मिटेंगे
सूरज कोई धरती से उछाल और तरह का

मुद्दत से मिरे नुत्क़-ओ-तख़य्युल में ठनी है
लफ़्ज़ और तरह के हैं ख़याल और तरह का

वो दूर से ईमेल पे कर लेते हैं बातें
हिज्र और तरह का है विसाल और तरह का

दुनिया की सभी आँखें हैं उस आँख पे हैराँ
अब दश्त में आया है ग़ज़ाल और तरह का

क़ीमत भी कोई पूछने आता नहीं 'साबिर'
दूकान में डाला है जो माल और तरह का
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Sabir Afaqi