मेरी ख़्वाहिश है एक बेटी हो
नाम जिस का सना रखूँगा मैं
नाम जिस का सना रखूँगा मैं
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एक ही शख़्स के कई चेहरे
और सब पे नक़ाब है देखो
और सब पे नक़ाब है देखो
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ढल चुकी है शाम भी अपनी
हो इजाज़त तो चलूं घर को
हो इजाज़त तो चलूं घर को
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समुंदर के किनारे बैठ कर साबिर
ग़ज़ल लिखते रहें हैं याद में तेरी
ग़ज़ल लिखते रहें हैं याद में तेरी
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