Wahab Danish

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@wahab-danish

Wahab Danish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Wahab Danish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
  • Nazm
ख़ाक के पुतलों में पत्थर के बदन को वास्ता
इस सनम-ख़ाने में सारी उम्र मुझ से ही पड़ा

जब सफ़र की धूप में मुरझा के हम दो पल रुके
एक तन्हा पेड़ था मेरी तरह जलता हुआ

जंगलों में घूमते फिरते हैं शहरों के फ़क़ीह
क्या दरख़्तों से भी छिन जाएगा आलम वज्द का

नर्म-रौ पानी में पहरों टिकटिकी बाँधे हुए
एक चेहरा देखता था बोलता सा आईना

ये सियाही ख़ून में इक रोज़ मिल जाएगी जब
चौदहवीं का चाँद कमरे में उतर आए तो क्या
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Wahab Danish
थकावटों से बैठ के सफ़र उतारिए कहीं
बला से गर्म रेत हो अगर न मिल सके ज़मीं

कहो तो इस लिबास में तुम्हारे साथ मैं चलूँ
ग़ुबार ओढ़ लूँगा मैं बदन पे आज कुछ नहीं

बतों का ग़ोल अब यहाँ उतर के पा सकेगा क्या
खड़े हो तुम जहाँ पे अब वो नर्म झील थी नहीं

खुले हुए मकान में अदा भी तेरी ख़ूब है
ज़बाँ से क़ुफ़्ल की तलब कलीद ज़ेर-ए-आस्तीं

तमाम उम्र पा-ब-गिल न जंगलों से मिल सका
दरख़्त ज़र्द हाल सा जो अब भी है खड़ा यहीं

वो रंग का हुजूम सा वो ख़ुशबुओं की भीड़ सी
वो लफ़्ज़ लफ़्ज़ से जवाँ वो हर्फ़ हर्फ़ से हसीं

अभी भी इस मकान में पलंग तख़्त मेज़ है
गए जो सैर के लिए तो फिर न आ सके मकीं
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Wahab Danish
हर रौशनी की बूँद पे लब रख चुकी है रात
बढ़ने लगे ज़मीं की तरफ़ तीरगी के हात

जंगल खड़े हैं भेद के और अजनबी शजर
शाख़ें नहीं सलीब कि दुश्वार है नजात

हो के कभी उदास यहाँ बैठता तो था
चल के किसी दरख़्त से पूछें तो उस की बात

हाथों में गर नहीं तो निगाहों को दीजिए
उस साहिब-ए-निसाब-ए-बदन से कोई ज़कात

इन पर्बतों के बीच थी मस्तूर इक गुफा
पत्थर की नरमियों में थी महफ़ूज़ काएनात
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Wahab Danish
कई भयानक काली रातों के अँधियारे में
तन्हाई में जलती बत्ती घर में हुई असीर

कोई अपना बन दरवाज़े दस्तक दे इक बार
ख़ामोशी की पीठ पे खींचे सीधी एक लकीर

सीने में टूटी हर ख़्वाहिश की नाज़ुक नन्ही नोक
कजलाई आँखों के आगे ख़्वाबों की ताबीर

तन का जोगी मन का साइल माँगे मीठी नींद
रोटी कपड़ा पैसा रख के रोए रात फ़क़ीर
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