vafaa karna ha | वफ़ा करना हमें खलता रहा है

  - Ajeetendra Aazi Tamaam

वफ़ा करना हमें खलता रहा है
मुहब्बत में ये दिल जलता रहा है

ग़मों की आँधियाँ सहते रहे हैं
ज़फ़ा का सिलसिला चलता रहा है

ख़ता करना हमें मंज़ूर कब था
ख़ता-वारों को ये खलता रहा है

निकल आए हर इक जंजाल से हम
ज़माना हाथ को मलता रहा है

हुई जिस पर बुज़ुर्गों की इनायत
हक़ीक़ी राह पर चलता रहा है

घटा कर साँसें देता है नया दिन
समय हर शख़्स को छलता रहा है

तराशो ज़ेहन को दिन रात अपने
बदन का हुस्न तो ढलता रहा है

उसे पाने की कोशिश में लगे हैं
जिगर में ख़्वाब जो पलता रहा है

  - Ajeetendra Aazi Tamaam

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