Meaning of

काहे

kahe • کاہے

क्यों; किस कारण से

why; for what reason

کیوں; کس وجہ سے

Unknown

आँधियों से लड़ रहे हैं जंग कुछ काग़ज़ के लोग
हम पे लाज़िम है कि इन लोगों को फ़ौलादी कहें

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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब'
ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं

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कोई हसीन बदन जिन की दस्तरस में नहीं
यही कहेंगे कि कुछ फ़ाएदा हवस में नहीं

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वो जिस पर उस की रहमत हो वो दौलत माँगता है क्या
मोहब्बत करने वाला दिल मोहब्बत माँगते है क्या

तुम्हारा दिल कहे जब भी उजाला बन के आ जाना
कभी उगता हुआ सूरज इजाज़त माँगता है क्या

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तारीख़ आ गई है उधर कार्ड छप गए
अब कब कहेगी तुझ को वो लड़का नहीं पसंद

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ये जो हिजरत के मारे हुए हैं यहाँ
अगले मिसरे पे रो के कहेंगे कि हाँ

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कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया

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उस वक़्त इंतिज़ार का आलम न पूछिए
जब कोई बार बार कहे आ रहा हूँ मैं

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तीनों ज़िद्दी हैं कि हम तुझ सेे कहेंगे भी नहीं
तू छूएगा भी नहीं ज़ख़्म भरेंगे भी नहीं

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'ग़ालिब' न कर हुज़ूर में तू बार बार अर्ज़
ज़ाहिर है तेरा हाल सब उन पर कहे बग़ैर

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आँधियों से लड़ रहे हैं जंग कुछ काग़ज़ के लोग
हम पे लाज़िम है कि इन लोगों को फ़ौलादी कहें

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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब'
ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं

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'काहे' शब्द जिज्ञासा और आश्चर्य की भावना को वहन करता है, अक्सर कविता में अस्तित्व संबंधी प्रश्नों या अर्थ की खोज को व्यक्त करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह जीवन की घटनाओं के पीछे के कारणों को समझने की मानव खोज को दर्शाता है।

कवि 'काहे' का उपयोग जीवन के रहस्यों में गहराई से जाने के लिए करते हैं, भाग्य, नियति और ईश्वर को प्रश्न करते हैं। यह अक्सर प्रेम, हानि और समय के प्रवाह की खोज करने वाले छंदों में दिखाई देता है।

कविता में, 'काहे' आत्मा की अनंत प्रश्नों की खोज के लिए एक माध्यम बन जाता है।