Meaning of

पिंदार

pindaar • پندار

गर्व; अहंकार

pride; arrogance

غرور; تکبر

Persian

हमीं को करता है तज़लील हैदर
हमीं पर है उसे पिन्दार लेकिन

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ये हक़ीक़त है, मज़हका नहीं है
वो बहुत दूर है, जुदा नहीं है

तेरे होंटों पे रक़्स करता है
राज़ जो अब तलक खुला नहीं है

जान ए जांँ तेरे हुस्न के आगे
ये जो शीशा है, आइना नहीं है

क्यूँ शराबोर हो पसीने में
मैं ने बोसा अभी लिया नहीं है

उस का पिंदार भी वहीं का वहीं
मेरे लब पर भी इल्तेजा नहीं है

जो भी होना था हो चुका काज़िम
अब किसी से हमें गिला नहीं है

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क्यूँँ हमारी याद भी अब याद बनकर रह गई है
लॉकडाउन हो गया है आप के पिंदार में क्या

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मेरे पिंदार-ए-मोहब्बत का तकाज़ा ये है
तुझ को चाहा भी तो औक़ात से बढ़ कर चाहा

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हमीं को करता है तज़लील हैदर
हमीं पर है उसे पिन्दार लेकिन

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ये हक़ीक़त है, मज़हका नहीं है
वो बहुत दूर है, जुदा नहीं है

तेरे होंटों पे रक़्स करता है
राज़ जो अब तलक खुला नहीं है

जान ए जांँ तेरे हुस्न के आगे
ये जो शीशा है, आइना नहीं है

क्यूँ शराबोर हो पसीने में
मैं ने बोसा अभी लिया नहीं है

उस का पिंदार भी वहीं का वहीं
मेरे लब पर भी इल्तेजा नहीं है

जो भी होना था हो चुका काज़िम
अब किसी से हमें गिला नहीं है

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'पिंदार' शब्द आत्म-सम्मान की उस सीमा को दर्शाता है जहाँ वह अहंकार में बदल जाता है। कविता में, यह आत्म-मूल्य और अति-आत्मविश्वास के बीच के आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है, जो मानव घमंड की जीवंत छवि प्रस्तुत करता है।

'पिंदार' का उपयोग कवि आत्म-महत्व और आत्मविश्वास तथा घमंड के बीच के नाजुक संतुलन को खोजने के लिए करते हैं। यह अक्सर विनम्रता के विपरीत होता है, आंतरिक शक्ति और बाहरी अहंकार के बीच के तनाव को उजागर करता है।

कविता के क्षेत्र में, 'पिंदार' मानव गर्व की द्वैत प्रकृति को दर्शाने वाला दर्पण है। यह हमें आत्म-विश्वास और अहंकार के बीच की पतली रेखा की याद दिलाता है।