Meaning of

शौक़-ए-शहादत

shauq-e-shahaadat • موتی

शहादत की चाह; बलिदान की लालसा

desire for martyrdom; longing for sacrifice

شہادت کی خواہش; قربانی کی تمنا

Arabic

एक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जाती दार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ को — Kaifi Azmi
जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत — Ibn E Insha
चला आया मकाँ ख़ाली करा कर मैं जले हैं आशियाने बे-ज़बाँ के भी — Ganesh gorakhpuri
मुक़द्दर तो भरा है मोतियों से कमी है सिर्फ़ तेरी कोशिशों की — Meem Alif Shaz
माँ की गाली देकर हिट हो जाते हैं इस कलयुग में कौआ मोती खाता है — Sanskar Shrivastav
आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही — Jaleel Manikpuri
है वही कश्ती पुरानी है वही दरिया मेरा जिस पे तू आने न पाया है वही रस्ता मेरा मैं मिरी मसरूफ़ियत से तंग आ जाता हूँ दोस्त मुझ को सीने से लगा के वक़्त कर ज़ाया' मेरा अपनी वहशत का तक़ाज़ा ढूंढता हूँ दर-ब-दर ले गया है कोहकन जिस रोज़ से तेशा मेरा याद कर कूचा-नवर्दी,याद कर उल्फ़त के दिन याद कर बातें मेरी और याद कर चेहरा मेरा जब हवाएँ थक गईं थीं कोशिशें कर दश्त में रेत तब रक्साँ हुई थी चूम कर साया मेरा बारिशों को मौसमों का खेल सब कहते हैं पर रो पड़े थे अब्र-पारे जान कर क़िस्सा मेरा आँख वो हँसती रही तो खिल उठे सूखे गुलाब आँख वो रोने लगी तो रो पड़ा सहरा मेरा ख़ुसरवान-ए-शहर मैं हो जाऊँगा इक लम्स से और फ़क़त इक दीद से भर जाएगा कासा मेरा मैं किताबों के जहाँ का एक ख़ुशक़िस्मत किताब नाव बच्चों ने बनाया फाड़ कर सफ़्हा मेरा उस नज़र को ख़्वाहिशों का शौक़ दे मेरा ख़याल उस जबीं को रौशनी देता रहे बोसा मेरा मैं मुसलसल बंद करता हूँ मगर फिर दम-ब-दम याद उस की खोलती जाती है दरवाज़ा मेरा — Prasoon
क्यूँ कोई कोख जो सूनी हो वो शर्मिंदा हो क्या ज़रूरी है कि हर सीप से मोती निकले — Vibha Jain 'Khwaab'
वो जब यहाँ था तो हम देखते न थे उस को वो जा रहा है तो हम खिड़कियाँ बदलते हैं — Tajammul Kazmi

अपने मूल अर्थ में, 'शौक़-ए-शहादत' शहादत की गहरी चाह को दर्शाता है, एक उच्च उद्देश्य के लिए बलिदान को अपनाने की तत्परता। कविता में, यह चाह अक्सर प्रेम और भक्ति के विषयों के साथ जुड़ी होती है, जहाँ अंतिम बलिदान किसी की गहरी भावनाओं का प्रतीक बन जाता है।

'शौक़-ए-शहादत' का उपयोग कवि अक्सर किसी प्रिय या उद्देश्य के प्रति अंतिम भक्ति को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह किसी भी कठिनाई को सहने की तत्परता का प्रतीक हो सकता है। यह मात्र चाहत के विपरीत है, क्योंकि यह क्रिया और बलिदान को इंगित करता है।

कविता की दुनिया में, 'शौक़-ए-शहादत' अंतिम बलिदान का प्रतीक है, मानव भक्ति की असीम गहराइयों का प्रमाण।