Meaning of

अक्स-ओ-साया

aks-o-saaya • چھاؤں

प्रतिबिंब; छाया

reflection; shadow

عکس; سایہ

Persian

वो पेड़ जिस की छाँव में कटी थी उम्र गाँव में
मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं

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यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया

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वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं
वो पेड़ मुझ से कोई बात क्यूँँ नहीं करता

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इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे
मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे

मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था
जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे

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मेरे आँगन में एक बूढ़ा पेड़
छाँव भी देता है, दुआएँ भी

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धूप भी आराम करती थी जहाँ
अपना ऐसी छाँव से नाता रहा

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मुझ को छाँव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा
मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में

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मुझे भी बख़्श दे लहजे की ख़ुश-बयानी सब
तेरे असर में हैं अल्फ़ाज़ सब, मआ'नी सब

मेरे बदन को खिलाती है फूल की मानिंद
कि उस निगाह में है धूप, छाँव, पानी सब

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ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बा'द

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बन गया है शहर तो अब गाँव इनको चाहिए
काट देते हैं शजर फिर छाँव इनको चाहिए

आँख में इज़्ज़त नहीं है लड़कियों के वास्ते
और पायल के लिए फिर पाँव इनको चाहिए

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वो पेड़ जिस की छाँव में कटी थी उम्र गाँव में
मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं

18

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यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया

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'अक्स-ओ-साया' अपने मूल में उपस्थिति और अनुपस्थिति की द्वैतता को पकड़ता है। प्रतिबिंब एक क्षणिक छवि है, वास्तविकता का एक क्षणिक पकड़, जबकि छाया एक स्थायी साथी है, यात्रा का मौन साक्षी। कविता इस द्वैतता को अपनाती है, प्रकाश और अंधकार, वास्तविकता और भ्रम के बीच के खेल का अन्वेषण करती है।

'अक्स-ओ-साया' का उपयोग कवि अक्सर पहचान और आत्म-धारणा के विषयों में करते हैं। यह जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति और मृत्यु की सदैव उपस्थित छाया को जागृत करता है। प्रतिबिंब और छाया के बीच का विरोधाभास आंतरिक और बाहरी आत्म, या अस्तित्व के देखे और अनदेखे पहलुओं का प्रतीक हो सकता है।

प्रकाश और छाया के नृत्य में, 'अक्स-ओ-साया' अस्तित्व के गहन सत्य को प्रकट करता है। यह क्षणिक और शाश्वत पर चिंतन के लिए आमंत्रित करता है।