Meaning of

चर्ख़

charkh • چرخ

पहिया; आकाश; भाग्य

wheel; sky; fate

پہیہ; آسمان; قسمت

Persian

राह तकते हुए आँखों का बुरा हाल हुआ
दिल लगाने के लिए अब कोई चर्ख़ा ढूँढ़े

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पतंग ऐसे नहीं उड़ती इसे वैसे उड़ाओ तुम
वही कहता है ये अक्सर जो बस चरखी पकड़ता है

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ब-चश्म-ए-अश्कबार है जबीं ज़मीन पर
मगर ये अश्क जा रहे हैं चर्ख़ की तरफ़

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कोई चर्ख़ाब सा लगे है इश्क़
ज़द में इस के जो आया डूब गया

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तश्त-अज़-बाम तो आज भी हूँ
हाँ मैं बदनाम तो आज भी हूँ

कुछ हो कोशिश मैं करता रहूँगा
वरना नाकाम तो आज भी हूँ

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चर्ख़ मेरी प्यास से वाक़िफ़ हुआ
धूप ने सहरा पे दरिया लिख दिया

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राह तकते हुए आँखों का बुरा हाल हुआ
दिल लगाने के लिए अब कोई चर्ख़ा ढूँढ़े

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पतंग ऐसे नहीं उड़ती इसे वैसे उड़ाओ तुम
वही कहता है ये अक्सर जो बस चरखी पकड़ता है

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चर्ख़ आकाश में अनंत रूप से घूमते हुए खगोलीय पहिये की छवियाँ उभारता है। कविता में, यह जीवन के चक्रीय स्वभाव और समय की अनिवार्य गति का प्रतीक है, जो अक्सर भाग्य और स्वर्ग से जुड़ा होता है।

कवि 'चर्ख़' का उपयोग भाग्य, समय के प्रवाह और ब्रह्मांड की भव्य योजना के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह अक्सर मानव स्थिति और ब्रह्मांडीय व्यवस्था पर विचार करने वाले छंदों में प्रकट होता है।

चर्ख़ भाग्य के धागों को घुमाता है, कालातीत अनुग्रह के साथ अस्तित्व की गाथा बुनता है।