Meaning of

ख़ाम

khaam • خام

कच्चा; अपरिपक्व

raw; unripe; immature

خام; ناپختہ

Persian

मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से

57

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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं

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जो दुनिया को सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी
जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफ़ान कहते हैं

132

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उदासी का सबब दो चार ग़म होते तो कह देता
फ़ुलाँ को भूल बैठा हूँ फ़ुलाँ की याद आती है

74

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क़स
में, वादे, दरवाज़े तो ठीक हैं पर
ख़ामोशी को तोड़ नहीं सकता हूँ मैं

70

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वरना तो बेवफ़ाई किसे कब मुआ'फ़ है
तू मेरी जान है सो तुझे सब मुआ'फ़ है

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मैं सुन रहा हूँ फ़ोन पे ख़ामोशियाँ तेरी
मैं जानता हूँ आज से क्या क्या तमाम है

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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िन्दगी एक नज़्म लगती है

59

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ख़ामोशी में आवाज़ का किरदार कोई है
जो बोलता रहता है लगातार, कोई है

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बिजली जाने पर भी जो चिल्लाता था
तेरे जाने पर वो क्यूँ ख़ामोश रहा ?

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मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से

57

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ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं

484

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'ख़ाम' का मूल अर्थ किसी वस्तु की प्राकृतिक, अपरिष्कृत अवस्था को दर्शाता है। कविता में, यह अक्सर संभावना और अपूर्णता की सुंदरता का प्रतीक होता है। 'ख़ाम' की कच्ची अवस्था प्रामाणिकता और विकास के वादे की भावना को जगाती है, जो वर्तमान और संभावित के बीच की नाजुक संतुलन को पकड़ती है।

कवि 'ख़ाम' का उपयोग मासूमियत और संभावना के विषयों को खोजने के लिए करते हैं। यह यात्रा की शुरुआत, जीवन के अनछुए कैनवास का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह शब्द परिपक्वता के विपरीत होता है, कच्चेपन से परिष्कार की यात्रा को उजागर करता है।

कविता में, 'ख़ाम' कच्चे और अपरिष्कृत का उत्सव है, शुरुआत में सुंदरता और आगे के वादे की याद दिलाता है।