Meaning of

रूह

rooh • روح

आत्मा; आत्मा; सार

soul; spirit; essence

روح; جان; جوہر

Arabic

मैं जानता हूँ तेरी रूह की तलब जानाँ
तुझे बदन की तरफ़ से नहीं छुऊँगा मैं

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जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था
वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी

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मुझ को बदन नसीब था पर रूह के बग़ैर
उस ने दिया भी फूल तो ख़ुशबू निकाल कर

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लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रुह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं

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रूहों के पर्दा-पोश गुनाहों से बे-ख़बर
जिस्मों की नेकियाँ ही गिनाता रहा हूँ मैं

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अब तो गाँवो में भी ईंटों के महल बसने लगे
गाँव की मिट्टी से वो ख़ुशबू रूहानी ख़ो गई

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दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया

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जिस्म चादर सा बिछ गया होगा
रूह सिलवट हटा रही होगी

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कभी उस को हम अपनी रूह का पैकर समझते थे
बहुत नादान थे मक़्तल को अपना घर समझते थे

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सख़्त सर्दी में ठिठुरती है बहुत रूह मिरी
जिस्म-ए-यार आ कि बेचारी को सहारा मिल जाए

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मैं जानता हूँ तेरी रूह की तलब जानाँ
तुझे बदन की तरफ़ से नहीं छुऊँगा मैं

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जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था
वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी

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'रूह' जीवन को प्राणवान बनाने वाली आत्मा या सार का प्रतीक है, जिसे अक्सर व्यक्ति के अस्तित्व के केंद्र के रूप में देखा जाता है। कविता में, यह आत्मा की यात्रा, उसकी इच्छाओं और अर्थ की अनंत खोज की खोज करता है।

कवि 'रूह' का उपयोग पहचान, पारगमन और भौतिक और आध्यात्मिक के बीच के अनंत संघर्ष के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह अक्सर सांसारिक और दिव्य के बीच एक पुल के रूप में कार्य करता है।

'रूह' अस्तित्व के सार को पकड़ता है, हमारे जीवन को आकार देने वाली अदृश्य शक्तियों की याद दिलाता है।