Meaning of

सख़ा

sakhaa • سخا

उदारता; दानशीलता

generosity; munificence

سخاوت; فیاضی

Arabic

कभी कपड़े सुखाने छत पे आओ
मैं कब से अलगनी बनकर खड़ा हूँ

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प्यास जहाँ की एक बयाबाँ तेरी सख़ावत शबनम है
पी के उठा जो बज़्म से तेरी और भी तिश्ना-काम उठा

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ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर
अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई

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आँखों से है समझ न आना
फिर होंठों से क्या समझाना

सुख-दुख तो हैं सखा तुम्हारे
सो इनसे अब क्या घबराना

हारा-जीता क्षणिक है प्यारे
गिरना उठना क्या शर्माना

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तुम बहाने कर के भी मेरे घर नहीं आती
कपड़े भी सुखाने तुम बाम पर नहीं आती

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नहीं आए ज़रूरत में सख़ा मेरे बुलाने पर,
सभी रोए वहीं लेकिन बदन मेरा जलाने पर

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इस लिए शाम को हम रोज़ उड़ाते थे पतंग
छत पे आती थी वो मलबूस सुखाने के लिए

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कभी कपड़े सुखाने छत पे आओ
मैं कब से अलगनी बनकर खड़ा हूँ

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प्यास जहाँ की एक बयाबाँ तेरी सख़ावत शबनम है
पी के उठा जो बज़्म से तेरी और भी तिश्ना-काम उठा

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'सख़ा' शब्द उदारता और खुले दिल से देने की भावना को व्यक्त करता है। कविता में, इसका उपयोग अक्सर बिना अपेक्षा के देने की महान गुणवत्ता का वर्णन करने के लिए किया जाता है। यह एक ऐसे हृदय की छवि प्रस्तुत करता है जो दया और परोपकार से परिपूर्ण है।

कवि 'सख़ा' का उपयोग निःस्वार्थता और परोपकार के विषयों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह अक्सर लालच के विपरीत होता है, एक उदार आत्मा की सुंदरता को उजागर करता है।

कविता में, 'सख़ा' दया की स्थायी शक्ति और देने की मानव क्षमता का प्रमाण है।