Meaning of

शौक़-ए-शहादत

shauq-e-shahaadat • موتی

शहादत की चाह; बलिदान की लालसा

desire for martyrdom; longing for sacrifice

شہادت کی خواہش; قربانی کی تمنا

Arabic

वो जब यहाँ था तो हम देखते न थे उस को
वो जा रहा है तो हम खिड़कियाँ बदलते हैं

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एक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जाती
दार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ को

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आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से
इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही

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जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत

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पुतलियों में घुला समुंदर है
मोतियों की दुकान आँखें हैं

आप तहक़ीक़ ही नहीं करते
सब ख़ज़ानों की खान आँखें हैं

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चला आया मकाँ ख़ाली करा कर मैं
जले हैं आशियाने बे-ज़बाँ के भी

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है वही कश्ती पुरानी है वही दरिया मेरा
जिस पे तू आने न पाया है वही रस्ता मेरा

मैं मिरी मसरूफ़ियत से तंग आ जाता हूँ दोस्त
मुझ को सीने से लगा के वक़्त कर ज़ाया' मेरा

अपनी वहशत का तक़ाज़ा ढूंढता हूँ दर-ब-दर
ले गया है कोहकन जिस रोज़ से तेशा मेरा

याद कर कूचा-नवर्दी,याद कर उल्फ़त के दिन
याद कर बातें मेरी और याद कर चेहरा मेरा

जब हवाएँ थक गईं थीं कोशिशें कर दश्त में
रेत तब रक्साँ हुई थी चूम कर साया मेरा

बारिशों को मौसमों का खेल सब कहते हैं पर
रो पड़े थे अब्र-पारे जान कर क़िस्सा मेरा

आँख वो हँसती रही तो खिल उठे सूखे गुलाब
आँख वो रोने लगी तो रो पड़ा सहरा मेरा

ख़ुसरवान-ए-शहर मैं हो जाऊँगा इक लम्स से
और फ़क़त इक दीद से भर जाएगा कासा मेरा

मैं किताबों के जहाँ का एक ख़ुशक़िस्मत किताब
नाव बच्चों ने बनाया फाड़ कर सफ़्हा मेरा

उस नज़र को ख़्वाहिशों का शौक़ दे मेरा ख़याल
उस जबीं को रौशनी देता रहे बोसा मेरा

मैं मुसलसल बंद करता हूँ मगर फिर दम-ब-दम
याद उस की खोलती जाती है दरवाज़ा मेरा

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मुक़द्दर तो भरा है मोतियों से
कमी है सिर्फ़ तेरी कोशिशों की

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क्यूँ कोई कोख जो सूनी हो वो शर्मिंदा हो
क्या ज़रूरी है कि हर सीप से मोती निकले

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माँ की गाली देकर हिट हो जाते हैं
इस कलयुग में कौआ मोती खाता है

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वो जब यहाँ था तो हम देखते न थे उस को
वो जा रहा है तो हम खिड़कियाँ बदलते हैं

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एक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जाती
दार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ को

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अपने मूल अर्थ में, 'शौक़-ए-शहादत' शहादत की गहरी चाह को दर्शाता है, एक उच्च उद्देश्य के लिए बलिदान को अपनाने की तत्परता। कविता में, यह चाह अक्सर प्रेम और भक्ति के विषयों के साथ जुड़ी होती है, जहाँ अंतिम बलिदान किसी की गहरी भावनाओं का प्रतीक बन जाता है।

'शौक़-ए-शहादत' का उपयोग कवि अक्सर किसी प्रिय या उद्देश्य के प्रति अंतिम भक्ति को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह किसी भी कठिनाई को सहने की तत्परता का प्रतीक हो सकता है। यह मात्र चाहत के विपरीत है, क्योंकि यह क्रिया और बलिदान को इंगित करता है।

कविता की दुनिया में, 'शौक़-ए-शहादत' अंतिम बलिदान का प्रतीक है, मानव भक्ति की असीम गहराइयों का प्रमाण।