Meaning of

सियाह-रात

siyaah-raat • سیاہ رات

अंधेरी रात; दुःख की रात

dark night; night of sorrow

سیاہ رات; غم کی رات

Persian

शब-ए-फ़िराक़ हावी है शब-ए-विसाल पे ऐ दोस्त
सियाह रात में अब तक बदन को कोफ़्त होती है

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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

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सियाह रात की सरहद के पार ले गया है
अजीब ख़्वाब था आँखें उतार ले गया है

है अब जो ख़ल्क़ में मजनूँ के नाम से मशहूर
वो मेरी ज़ात से वहशत उधार ले गया है

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सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले

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करवट-करवट घूँट-घूँट भर, स्याह रात गुज़री ऐसे
नींद किसी ने तह कर के, अलमारी में रख दी जैसे

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वो जिस की याद ने जीना मुहाल कर रखा है
उसी की आस ने मुझ को सँभाल कर रखा है

सियाह रातों में साए से बातें करता है
तुम्हारे ग़म ने नया रोग पाल कर रखा है

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काली सियाह रातों को
सूरज सा उजियारा दो

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डूब जाता है ये दिल भी साथ आफ़ताब के
हर सियाह रात मेरा ज़ब्त आज़माती है

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शब-ए-फ़िराक़ हावी है शब-ए-विसाल पे ऐ दोस्त
सियाह रात में अब तक बदन को कोफ़्त होती है

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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

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यह वाक्यांश अंधकार में लिपटी रात की छवि प्रस्तुत करता है, जो अक्सर दुःख या निराशा के समय का प्रतीक होता है। कविता में, यह अकेलेपन और अनकहे दुःख के बोझ को दर्शाता है।

'सियाह-रात' का उपयोग कवि अक्सर अकेलेपन और आत्मचिंतन के विषयों को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह भोर की आशा के साथ भी विपरीत हो सकता है, जो निराशा और नवीनीकरण के चक्रीय स्वभाव को उजागर करता है।

कविता के क्षेत्र में, 'सियाह-रात' मानव भावनाओं की गहराईयों का पता लगाने के लिए एक कैनवास बन जाता है।