Meaning of

सू-ए-जानाँ

soo-e-jaanaan • سو جاناں

प्रिय की ओर; प्रेमी की दिशा में

towards the beloved; in the direction of the beloved

سوئے جاناں; محبوب کی طرف

Persian

कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ

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सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

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कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ

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सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

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मूल रूप से, 'सू-ए-जानाँ' एक प्रिय व्यक्ति की ओर भौतिक या रूपकात्मक गति का सुझाव देता है। कविता में, यह ऐसी यात्रा में निहित लालसा और भक्ति को पकड़ता है, जो अक्सर दिव्य या परम सत्य के साथ आत्मा के मिलन की खोज का प्रतीक है।

कवि अक्सर 'सू-ए-जानाँ' का उपयोग प्रिय के साथ निकटता की लालसा व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह आशा और इच्छा से भरी यात्रा की छवि को उजागर करता है, जो अलगाव और दूरी के विषयों के विपरीत है।

कविता में, 'सू-ए-जानाँ' प्रेम और सत्य की ओर अनंत यात्रा का प्रतीक बन जाता है। यह पाठकों को लालसा और पूर्ति के मार्गों पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है।