Meaning of

तमीज़-ए-लाला-ओ-गुल

tameez-e-laala-o-gul • موتی

लाल और गुलाब की पहचान; सूक्ष्म भेद

discernment of tulip and rose; subtle distinction

لالہ اور گلاب کی تمیز; باریک فرق

Persian

तुम पर जँचता है भोलापन
माथे पर बिंदी के जैसे

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आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से
इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही

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जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया
तो हम भी राह से कंकर समेट लाए बहुत

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पुतलियों में घुला समुंदर है
मोतियों की दुकान आँखें हैं

आप तहक़ीक़ ही नहीं करते
सब ख़ज़ानों की खान आँखें हैं

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चला आया मकाँ ख़ाली करा कर मैं
जले हैं आशियाने बे-ज़बाँ के भी

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है वही कश्ती पुरानी है वही दरिया मेरा
जिस पे तू आने न पाया है वही रस्ता मेरा

मैं मिरी मसरूफ़ियत से तंग आ जाता हूँ दोस्त
मुझ को सीने से लगा के वक़्त कर ज़ाया' मेरा

अपनी वहशत का तक़ाज़ा ढूंढता हूँ दर-ब-दर
ले गया है कोहकन जिस रोज़ से तेशा मेरा

याद कर कूचा-नवर्दी,याद कर उल्फ़त के दिन
याद कर बातें मेरी और याद कर चेहरा मेरा

जब हवाएँ थक गईं थीं कोशिशें कर दश्त में
रेत तब रक्साँ हुई थी चूम कर साया मेरा

बारिशों को मौसमों का खेल सब कहते हैं पर
रो पड़े थे अब्र-पारे जान कर क़िस्सा मेरा

आँख वो हँसती रही तो खिल उठे सूखे गुलाब
आँख वो रोने लगी तो रो पड़ा सहरा मेरा

ख़ुसरवान-ए-शहर मैं हो जाऊँगा इक लम्स से
और फ़क़त इक दीद से भर जाएगा कासा मेरा

मैं किताबों के जहाँ का एक ख़ुशक़िस्मत किताब
नाव बच्चों ने बनाया फाड़ कर सफ़्हा मेरा

उस नज़र को ख़्वाहिशों का शौक़ दे मेरा ख़याल
उस जबीं को रौशनी देता रहे बोसा मेरा

मैं मुसलसल बंद करता हूँ मगर फिर दम-ब-दम
याद उस की खोलती जाती है दरवाज़ा मेरा

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मुक़द्दर तो भरा है मोतियों से
कमी है सिर्फ़ तेरी कोशिशों की

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क्यूँ कोई कोख जो सूनी हो वो शर्मिंदा हो
क्या ज़रूरी है कि हर सीप से मोती निकले

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माँ की गाली देकर हिट हो जाते हैं
इस कलयुग में कौआ मोती खाता है

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वो जब यहाँ था तो हम देखते न थे उस को
वो जा रहा है तो हम खिड़कियाँ बदलते हैं

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तुम पर जँचता है भोलापन
माथे पर बिंदी के जैसे

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आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से
इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही

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इस वाक्यांश का मूल भाव सूक्ष्म भेदों और बारीकियों को पहचानने की क्षमता से जुड़ा है, जैसे लाल और गुलाब की नाज़ुक सुंदरता के बीच अंतर करना। कविता में, यह परिष्कृत दृष्टि और संवेदनशीलता की भावना को जगाता है।

कवि अक्सर इस वाक्यांश का उपयोग सूक्ष्मता और विवेक के महत्व को उजागर करने के लिए करते हैं। इसका उपयोग स्पष्ट और छिपे हुए, ऊँचे और शांत, या साहसी और नाज़ुक के बीच अंतर दिखाने के लिए किया जा सकता है।

यह वाक्यांश सूक्ष्मता की सुंदरता और प्रकृति तथा मानव अनुभव में विवेक की कला पर चिंतन करने के लिए आमंत्रित करता है।