हम भी रहे कभी तो दिवाने नए नए

महसूस भी किए वो फ़साने नए नए

वो रहगुज़र कहाँ जो दुआ से नवाज़ दे
दर पर अभी फ़क़ीर न आने नए नए

आते रहे ख़याल न जाने कभी तेरे
मक़सूद सा लगे वो सुनाने नए नए

उस दौर का पता न चला कुछ इसीलिए
पूछे कभी सवाल ज़माने नए नए

सीखे कभी तो थे न हमीं ग़लतियों से ही
तज्वीज़ से ही घर है बसाने नए नए

ऐसे लिखो ग़ज़ल भी 'मनोहर' कभी कभी
कुछ शे'र फिर तुम्हें हैं सुनाने नए नए

— Manohar Shimpi

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