Manohar Shimpi

Manohar Shimpi

@manohar.shimpi2000

M Shimpi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in M Shimpi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

आज भी तू बे-तग़य्युर सी लगे क्या बात है और मैं हालात से दो हाथ करते रह गया — Manohar Shimpi
ये दिल तेरी ज़ुल्फ़ों से गिरफ़्तार हुआ है ख़ामोश लबों से ही तो इज़हार हुआ है — Manohar Shimpi
मुझे धुआँ न समझ आसमान ही हूँ मैं ज़मीन से ही जुड़ा क़द्र-दान ही हूँ मैं — Manohar Shimpi
आप कहते ऐसे हम हैं वैसे हम हैं जैसे हारे वैसे ही चेहरों पे ग़म हैं — Manohar Shimpi
रोष इतना बढ़ा बढ़ा सा है हर कोई फिर ख़फ़ा ख़फ़ा सा है — Manohar Shimpi
ये अजीब ही हैं अदावतें जो इसी सदी का शजर नहीं वो ही दाव अब्र सा जब चले है तो बादलों का भी डर नहीं — Manohar Shimpi
हम भी रहे कभी तो दिवाने नए नए महसूस भी किए वो फ़साने नए नए — Manohar Shimpi
कामयाबी से फली फूली मुहब्बत है तेरी हम सेफ़र के साथ दुनिया ख़ूब-सूरत है तेरी — Manohar Shimpi
देखा कहाँ सोचा कहाँ तेरे सिवा उस को कभी बातें हुईं लेकिन नहीं मैं ने सुना उस को कभी — Manohar Shimpi
रौशनी चराग़ों से दूर रह नहीं सकती हम-नशीं क़रीबी का शोक सह नहीं सकती — Manohar Shimpi
सच बताओं मर्सिया-ख़्वानी किसे मालूम है आँख से बहता हुआ पानी किसे मालूम है — Manohar Shimpi
मिलो बड़ों से समझ लो अदब किसे कहते पता तभी ही चलेगा सबब किसे कहते — Manohar Shimpi
साथ साया रहा जो मिला ही नहीं जुस्तजू के सिवा कुछ पता ही नहीं — Manohar Shimpi
उस्लूब से तहज़ीब-ए-कुहन बोल रहा है हर शख़्स से करने को जतन बोल रहा है — Manohar Shimpi
तुम वादियों को जन्नत-ए-कश्मीर ही कहते रहे फिर ख़ुशनुमा माहौल में ही लोग भी बसते रहे — Manohar Shimpi
ख़ूब उन को सभी की दुआएँ मिली बेगुनाहों को फिर क्यूँँ सज़ाएँ मिली — Manohar Shimpi
हश्र से फूल सी ही उभरती कभी फ़िक्र में फिर कली कोई मरती कभी — Manohar Shimpi
कितनी मुश्किल दरिया की क्या अजीब सी वो कहानी है आज नहीं तो कल फिर जान समुंदर में ही गँवानी है — Manohar Shimpi
कैसी कोशिश कैसा अंदाज़ा तेरा हर-तरफ़ बातें तेरी चर्चा तेरा — Manohar Shimpi
माँ ब-दौलत रौशनी मुझ को मिली इक नई ही ज़िंदगी मुझ को मिली — Manohar Shimpi

Ghazal

ये दिल तेरी ज़ुल्फ़ों से गिरफ़्तार हुआ है ख़ामोश लबों से ही तो इज़हार हुआ है वो शोख़ निगाहों से तलबगार हुआ है दहलीज़ सजाके ही वो तैयार हुआ है आँखों से अगर नूर छलकता तो यक़ीनन महसूस ये होता तेरे से प्यार हुआ है मालूम हुआ कैसे वफ़ाऍं ही निभाऍं ता'लीम से कोई न वफ़ादार हुआ है महफ़िल मेरी रंगीन हुई हुस्न से लेकिन माहौल तुम्हीं से मेरे सरकार हुआ है क्या ख़ूब अदा और हसीं सी तेरी बाहें ऐ इश्क़ गले लग के ही ज़ुन्नार हुआ है आसान नहीं यार ग़म-ए-हिज्र में जीना दिल मेरा लगा जैसे गुल-ए-ख़ार हुआ है बस प्यार ग़म-ए-राह से कुछ और ही होता दिलदार तेरी सोच से ग़म-ख़्वार हुआ है मत बूझ पहेली वो शिफ़ा की ही मनोहर इक तीर मेरे दिल में जिगर पार हुआ है — Manohar Shimpi
जो दिए दियों से जले बुझे ही नहीं उन्हीं का ये काम है यूँँ ही कारवाँ बढ़े रौशनी सा ये ज़िंदगी का क़याम है ये वुजूद और हरी-भरी तेरी बरकतें दिखें हर जगह किसी की ज़बाँ में लिखा हुआ सुना माँ तुझे ही सलाम है न उदास हो न शिकायतें किसी की करो अभी तुम सनम ये मुहब्बतें ये शराफ़तें ये बखान किस का क़लाम है मिली ढ़ेर सारी नसीहतें हमें ज़िंदगी के ही मोड़ पर वो पड़ाव भी तो अजीब सा ही लगे मुझे वो क़याम है वो महक चमक कहाँ खो गई वो निज़ाम ही अभी है कहाँ वो कभी रहा हो फ़लक पे फिर भी बग़ैर उस के ये शाम है वो उसूल बुत से बड़े हुए वो हक़ीक़तन ही कड़े हुए रहे सब के सिर्फ़ दिलों में अब वो फ़क़त ख़ुदा का ही नाम है — Manohar Shimpi
कामयाबी से फली फूली मुहब्बत है तेरी हम सेफ़र के साथ दुनिया ख़ूब-सूरत है तेरी मुख़्तलिफ़ लोगों से मिलने पर तसल्ली ही हुई फिर पता मुझ को चला कितनी ज़रूरत है तेरी घर चलाने के लिए कितनी मशक़्क़त ही लगे सोच छोटी ही अगर हो वो हिमाक़त है तेरी दोस्त है वो ही हमारा ख़ास समझो अब उसे देख उस के भी दिल में ख़ूब इज़्ज़त है तेरी दोस्तों के दोस्त हैं हम और दुश्मन हैं नहीं अम्न के ही वास्ते सब को ज़रूरत है तेरी रात दिन जो हर किसी के वास्ते मेहनत करें इस लिए गहरे समुंदर सी ही इज़्ज़त है तेरी जंग से हैरान टैरिफ़ से परेशाँ सब हुए एक हाथी और कुछ साथी को फ़ुर्सत है तेरी इस नए ही दौर में देखे बहुत सुलझे हुए है जुदा सब से 'मनोहर' वो ज़ेहानत है तेरी — Manohar Shimpi

Nazm

"परछाई" वादियों में आवाज़ कुछ तो सुनाई दे रही थी झरने से पानी बहने की आवाज़ आ रही थी पत्तों की खड़खड़ाहट भी सुनाई दे रही थी धीमे-धीमे ठंडी हवा बदन को चूम रही थी अँधेरे में कभी कोई रौशनी चमक रही थी ऐसा क्या देखा जो तुम ख़ामोश खड़ी थी तुम्हारे आँखों में कुछ और दिखाई दे रहा था कुछ कहने का तुम में होश भी तो नहीं था तुम्हारे आजू-बाजू भी कोई मौजूद नहीं था सुना था बरसों पहले वहाँ हादसा हुआ था कोई और है वहाँ ऐसा आग़ाज़ हो रहा था ऐसा क्या हुआ था जिस से सन्नाटा छाया था तुम जो समझ रहे थे वो वाक़ई में मैं नहीं थी मेरे जैसे शक्ल सूरत सी कोई और खड़ी थी मैं तो अपने सहेली संग वादियों में घूम रही थी घूमते फिरते व्यंजनों का ख़ूब आनंद ले रही थी रूह से रूह तक का सफ़र ये कैसे दस्तरस थी रूहों का क्या 'मनोहर' कल आपसे संगत की थी — Manohar Shimpi