जब चराग़ों से उजाला हो तभी
कौन रातों से यहाँ नाराज़ हैं
कौन रातों से यहाँ नाराज़ हैं
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सफ़र में मैं न तन्हा था दु'आओं से
हुआ हूँ मुतमइन तेरी वफ़ाओं से
हुआ हूँ मुतमइन तेरी वफ़ाओं से
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कभी मासूम बच्चों को कहीं रोते हुए देखा
किसी उन के क़रीबी को कभी खोते हुए देखा
किसी उन के क़रीबी को कभी खोते हुए देखा
सियासत तो बहुत होती गहन गंभीर मुद्दों पर
किसी का बोझ नेता को न ही ढ़ोते हुए देखा
किसी उम्मीद की कोई किरण से ही किसी को फिर
मुसलसल ही बिखरकर फिर खड़े होते हुए देखा
यहाँ दौलत यहाँ शोहरत कहाँ मिलती किसी को भी
उसे पाने यहाँ पर फिर बहुत खोते हुए देखा
मिज़ाजी को नशा कोई नशे में ही डुबा देता
उसे फिर डूबते गिरते कहीं सोते हुए देखा
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तुझे आसमाँ में न हम देखते हैं
ज़मीं पर कहीं क्यूँ सितम देखते हैं
ज़मीं पर कहीं क्यूँ सितम देखते हैं
ज़मीं पर करिश्में कहीं देखते हैं
उसी में कभी हम मनम देखते हैं
फ़िज़ाएँ अदाएँ सभी देखते हैं
निगाह-ए-करम फिर सनम देखते हैं
किसी काम से क्यूँ किसे सोचते हैं
ग़लत सोच से हम भरम देखते हैं
हमेशा सफ़र में तुझे याद करते
तुझे सोच के फिर करम देखते हैं
सफ़र में अकेले हमीं तो चले हैं
हमारे न नक़्शे क़दम देखते हैं
तरक्की हमीं जब कभी देखते हैं
ख़ुशी से उसी में करम देखते हैं
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कभी तकरार थोड़ी सी मुहब्बत में ज़रूरी है
अगर है इश्क़ गहरा फिर वो गहराई उसी में हो
अगर है इश्क़ गहरा फिर वो गहराई उसी में हो
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ज़ेहन में है मुलाक़ात तेरी
याद है आज भी बात तेरी
याद है आज भी बात तेरी
इत्र जैसे महक ख़ूब आती
तेज़ जब तू करे बात तेरी
याद तू ख़ूब आती मुझे ही
फिर न भूलूँ हसीं रात तेरी
क्यूँ झुकी थी तभी वो निगाहें
बे-ज़बाँ तो न थी बात तेरी
चंद लम्हें लगे सिर्फ़ मिलने
हिज्र में क्यूँ कटी रात तेरी
दूर रहके यहीं है लगे तू
कब सुनी पास से बात तेरी
अब न कोई मुलाक़ात बातें
लफ़्ज़ था
में रहें बात तेरी
देखते ही रहा ख़ामुशी से
शाम-ए-ग़म से भरी रात तेरी
ख़्वाब ऐसे मनोहर न देखे
वक़्त-बे-वक़्त बारात तेरी
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