अपना क़िस्सा ही कहते हो
फिर भी ग़मगीं क्यूँ रहते हो
अक्सर ग़लती करके भी क्यूँ
फिर कैसे चुप ही रहते हो
बातें सुनते कैसी कैसी
उन बातों में क्यूँ बहते हो
अपनी कमियाँ ही बतलाकर
तानें लोगों के सहते हो
बदले मौसम को तो समझो
अक्सर उलझे क्यूँ रहते हो
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