Wasi Shah

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@wasi-shah

Wasi Shah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Wasi Shah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे अन-कही बात को समझोगे तो याद आऊँगा — Wasi Shah
तुम मेरी पहली मोहब्बत तो नहीं हो लेकिन मैं ने चाहा है तुम्हें पहली मोहब्बत की तरह — Wasi Shah
हर एक शख़्स चलेगा हमारी राहों पर मोहब्बतों में हमें वो मिसाल होना है — Wasi Shah
मालूम हमें भी हैं बहुत से तेरे क़िस्से पर बात तेरी हम सेे उछाली नहीं जाती — Wasi Shah
ज़िन्दगी अब के मेरा नाम ना शामिल करना गर ये तय है कि यही खेल दोबारा होगा — Wasi Shah
न तुम्हें होश रहे और न मुझे होश रहे इस क़दर टूट के चाहो मुझे पागल कर दो — Wasi Shah
तेरे गले में जो बाँहों को डाल रखते हैं तुझे मनाने का कैसा कमाल रखते हैं — Wasi Shah
माँगे तो अगर जान भी हँस के तुझे दे दें तेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती — Wasi Shah
हम जान से जाएँगे तभी बात बनेगी तुम से तो कोई राह निकाली नहीं जाती — Wasi Shah

Ghazal

हज़ारों दुख पड़ें सहना मोहब्बत मर नहीं सकती है तुम से बस यही कहना मोहब्बत मर नहीं सकती तिरा हर बार मेरे ख़त को पढ़ना और रो देना मिरा हर बार लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती किया था हम ने कैम्पस की नदी पर इक हसीं वा'दा भले हम को पड़े मरना मोहब्बत मर नहीं सकती पुराने अहद को जब ज़िंदा करने का ख़याल आए मुझे बस इतना लिख देना मोहब्बत मर नहीं सकती वो तेरा हिज्र की शब फ़ोन रखने से ज़रा पहले बहुत रोते हुए कहना मोहब्बत मर नहीं सकती गए लम्हात फ़ुर्सत के कहाँ से ढूँड कर लाऊँ वो पहरों हाथ पर लिखना मोहब्बत मर नहीं सकती — Wasi Shah
समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्यूँँ ही क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर 'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं — Wasi Shah

Nazm

कल हमेशा की तरह उस ने कहा ये फ़ोन पर मैं बहुत मसरूफ़ हूँ मुझ को बहुत से काम हैं इस लिए तुम आओ मिलने मैं तो आ सकती नहीं हर रिवायत तोड़ कर इस बार मैं ने कह दिया तुम जो हो मसरूफ़ तो मैं भी बहुत मसरूफ़ हूँ तुम जो हो मशहूर तो मैं भी बहुत मारूफ़ हूँ तुम अगर ग़मगीन हो मैं भी बहुत रंजूर हूँ तुम थकन से चूर तो मैं भी थकन से चूर हूँ जान-ए-मन है वक़्त मेरा भी बहुत ही क़ीमती कुछ पुराने दोस्तों ने मिलने आना है अभी मैं भी अब फ़ारिग़ नहीं मुझ को भी लाखों काम हैं वर्ना कहने को तो सब लम्हे तुम्हारे नाम हैं मेरी आँखें भी बहुत बोझल हैं सोना है मुझे रतजगों के बा'द अब नींदों में खोना है मुझे मैं लहू अपनी अनाओं का बहा सकता नहीं तुम नहीं आतीं तो मिलने मैं भी आ सकता नहीं उस को ये कह के 'वसी' मैं ने रिसीवर रख दिया और फिर अपनी अना के पाँव पे सर रख दिया — Wasi Shah
काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को और बे-ताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता — Wasi Shah