anupam shah

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@anupamshah

anupam shah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in anupam shah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

हैं जो बातें ये बस ख़याली हैं
और फिर हाथ भी तो ख़ाली हैं

anupam shah

अभी सिक्का हवा में है तो फ़ैसला कर लो
ज़मीं पे गिर गया अगर तो फ़ैसला कैसा

anupam shah

रात से रोज़ लड़ रहे हैं हम
एक ही ज़िद पे अड़ रहे हैं हम

anupam shah

इस तरह से तुम्हें मैं ज़िंदगी में लाऊँगा
गीत पर गीत लिख के रोज़ तुझको गाऊँगा

एक शायर ने तेरा नाम लिख लिया दिल पे
और फिर क्या हसीं ग़ज़ल तुझे सुनाऊँगा

anupam shah

लो ख़ुद मुख़्तार होकर देखते हैं
कि अपने यार होकर देखते हैं

बचे बर्बाद होने से हैं अब तक
चलो इस बार होकर देखते हैं

यहाँ से मसअला ये हल न होगा
इसे उस पार होकर देखते हैं

कोई ख़तरा नहीं है दुश्मनी में
किसी का प्यार होकर देखते हैं

anupam shah

वही मंज़र मुझे हर बार नज़र आता है
आँख मूँदूँ तो मुझे यार नज़र आता है

ऐसे तो मौत का मेरी कोई क़ातिल ही नहीं
वैसे हर शख़्स गुनहगार नज़र आता है

anupam shah

तस्वीर ऐसी आई है कुछ अस्ल में तेरी
उलझन भी है राहत भी है कुछ वस्ल में तेरी

तू गर डरेगा आज तो तेरा भला होगा
पर जान ले जो डर उठेगा नस्ल में तेरी

anupam shah

चाह ली आज रौशनी मैंने
एक बेफ़िक्र ज़िन्दगी मैंने

बाम पर फिर दिया जलाया है
आपकी राह फिर तकी मैंने

anupam shah

हमारे नाम का पत्थर भी तैर जाएगा
मगर ये शर्त है पानी में सिर्फ़ तुम डालो

anupam shah

चुप रहकर सुलझा पाओ तो ग़ुस्सा होकर मत दिखलाना
परदों से गर काम बने तो दीवारों को मत खिंचवाना

anupam shah

बहुत कुछ खो दिया है तब कहीं अब ख़ुद को पाया है
मिरी जाँ इश्क़ हो या दुश्मनी अब मैं न बदलूँगा

anupam shah

हम ज़रा बेख़याल होते हैं
हमसे जब भी सवाल होते हैं

झूठ कहते हुए नहीं डरते
लोग कितने कमाल होते हैं

anupam shah

तुम्हें मैं बस तुम्हारी सम्त रखकर लौट आऊँगा
मुझे मालूम है जो दर्द है रस्ता भटकने का

anupam shah

हँसना-वसना धीरे धीरे कम होगा
धीरे धीरे दिख जाएंगे सब चेहरे

anupam shah

कुछ दीवारों पर दरवाज़े होते हैं
कुछ दरवाज़े दीवारों से होते हैं

anupam shah

हज़ारों बार मर मर कर यही इक फ़लसफ़ा जाना
कि जब तक ज़िंदगी है तब तलक जीना ज़रूरी है

anupam shah

किसी पत्थर की बस्ती में वो लम्हा छुप के बैठा है
अभी तो कुछ बरस लग जाएँगे दीवार ढहने में

anupam shah

मैं लिक्खूँगा ज़माने एक दिन तेरे ये ताने सब
अभी मसरूफ़ हूँ बस यूं जरा बनने बिगड़ने में

anupam shah

समंदर यूँ नहीं खारा हुआ था
बिछड़ कर आपसे हारा हुआ था

कि मुझमें हौसला तो था बहुत पर
मैं बस इस वक़्त का मारा हुआ था

anupam shah

सुलझाऊँ तेरी ज़ुल्फ़ से हाथों की लकीरें
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा

anupam shah

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