anupam shah

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@anupamshah

anupam shah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in anupam shah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अभी सिक्का हवा में है तो फ़ैसला कर लो ज़मीं पे गिर गया अगर तो फ़ैसला कैसा — anupam shah
चुप रह कर सुलझा पाओ तो ग़ुस्सा होकर मत दिखलाना परदों से गर काम बने तो दीवारों को मत खिंचवाना — anupam shah
हँसना-वसना धीरे धीरे कम होगा धीरे धीरे दिख जाएँगे सब चेहरे — anupam shah
हज़ारों बार मर मर कर यही इक फ़लसफ़ा जाना कि जब तक ज़िंदगी है तब तलक जीना ज़रूरी है — anupam shah
मैं लिक्खूँगा ज़माने एक दिन तेरे ये ता'ने सब अभी मसरूफ़ हूँ बस यूँ जरा बनने बिगड़ने में — anupam shah
हैं जो बातें ये बस ख़याली हैं और फिर हाथ भी तो ख़ाली हैं — anupam shah
रात से रोज़ लड़ रहे हैं हम एक ही ज़िद पे अड़ रहे हैं हम — anupam shah
हमारे नाम का पत्थर भी तैर जाएगा मगर ये शर्त है पानी में सिर्फ़ तुम डालो — anupam shah
बहुत कुछ खो दिया है तब कहीं अब ख़ुद को पाया है मिरी जाँ इश्क़ हो या दुश्मनी अब मैं न बदलूँगा — anupam shah
तुम्हें मैं बस तुम्हारी सम्त रख कर लौट आऊँगा मुझे मालूम है जो दर्द है रस्ता भटकने का — anupam shah
कुछ दीवारों पर दरवाज़े होते हैं कुछ दरवाज़े दीवारों से होते हैं — anupam shah
किसी पत्थर की बस्ती में वो लम्हा छुप के बैठा है अभी तो कुछ बरस लग जाएँगे दीवार ढहने में — anupam shah

Ghazal

हज़ारों कोशिशों के बा'द हम मज़बूर होने हैं न जाने ज़ख़्म कितने और अब नासूर होने हैं तुम्हारे नाम का तो ज़िक्र थोड़ा सा हुआ है बस हमारे और भी क़िस्से अभी मशहूर होने हैं ज़रा सी उलझनों में छोड़ देते हो जो तुम राहें अभी तो मंज़िलों तक इम्तिहाँ भरपूर होने हैं मेरे हालात भी अक्सर ये मुझ सेे पूछ लेते हैं तेरी तक़दीर के दिन कब तुझे मंज़ूर होने हैं तुम्हारे बा'द से घर में उजाला भी नहीं आया अँधेरे बस तुम्हारे नूर से ही दूर होने हैं बदल जाएँगे चेहरे पर नहीं बदलेगी ये फितरत ये कच्चे आम थोड़े वक़्त में अमचूर होने हैं — anupam shah

Nazm

"वो एक ख़्वाब था" वो एक ख़्वाब था जो अब मुझे नहीं आता और कोई शख़्श इन आँखों को अब नहीं भाता न जाने क्यूँ ही हौसलों को हम सँभाले हैं ये जबकि जानते हैं दूर अब उजाले हैं उसे न चाह थी पर इश्क़ कर लिया हम ने चराग़ को हवा की सम्त रख दिया हम ने किसी दरख़्त के साए में मिला था मुझ को मुझे उलझाए हुए ख़ुद में मिला था मुझ को गले से लग के मेरी रूह को राहत दी थी उदास चेहरे को अपनी हथेलियाँ दी थी मेरे माथे की सलवटों को चूम कर उस ने जो न क़िस्मत में लिखी थीं मुझे ख़ुशियाँ दी थीं ख़ुशी के आँसुओं में उस को डूबते देखा मैं ने उस रोज़ यूँँ सूरज को डूबते देखा चाँद का रंग फिर घुला था शफ़क़ में ऐसे मेरा रंग उस के रंग में हो घुल गया जैसे शादमानी सी हरारत हुई कोई दिल में कोई तितली-सी बदन में मेरे उड़ी जैसे मुझे यूँँ भी लगा ये वक़्त ठहर जाए कहीं या तो मर जाऊँ या मैं उस का ही हो जाऊँ अभी रात उस रात के तो बा'द भी बहुत आईं ढूँढ़ता था मगर आहट तेरी नहीं पाई ये बात और है क़िस्मत बदल नहीं सकती मैं चाहे जितना चाह लूँ तू मिल नहीं सकती ख़फ़ा रहो मगर मेरे सामने तो आओ तुम न कुछ कहो अगर तो आँख तो दिखाओ तुम मैं जानता हूँ मैं ने दर्द दिया है तुम को किसी तरह से मेरे दर्द को मिटाओ तुम हथेलियों में मेरी सब्र की लकीर न थी तुझे मिल पाऊँ मैं ऐसी भी तो तक़दीर न थी उसी शिद्दत से ही मैं अब भी चाहता हूँ तुम्हें न हो यक़ीन अगर इंतिज़ार देख मेरा फिरूँ मैं दर-ब-दर कि अब कहाँ को जाऊँ मैं एक मुश्ताक़ था बेज़ार न हो जाऊँ मैं थी ये तलब कि तुझ पे जाँ निसार कर दूँ मैं और अब यूँँ है कि तैयार न हो जाऊँ कहीं — anupam shah