anupam shah

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    कुछ तो थी बात मुहब्बत में तेरी शाहजहाँ
    ताज अब कौन बनाता है बिछड़ने पे यहॉं
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    ख़्वाब इतना भी हसीं मत देखो
    नींद टूटे तो न ये शब गुज़रे
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    अकेली रात में आँखों को मेरी एक सपना दे
    बुरा दे ख़्वाब मुझको तू मगर तू ख़्वाब अपना दे
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    बड़े बूढों के घर को अब जो बच्चे छोड़ देते हैं
    समंदर साहिलों तक आ के रस्ता मोड़ देते हैं

    वसीयत में कोई भी दस्तख़त जाली नहीं होता
    ये पूरे होश में अपने ही घर को तोड़ देते हैं
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    गुनाहों का नहीं है इल्म उसको क़ैदख़ाने में
    यक़ीनन छूट जाएगा तो फिर ये दिल लगाएगा
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    संग-ए-मरमर की मूरत नहीं आदमी
    इस क़दर ख़ूबसूरत नहीं आदमी

    चंद क़िस्सों की दरकार है बस इसे
    आदमी की ज़रूरत नहीं आदमी
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    यानी अब उसकी मुहब्बत का हलफ़ माँगूँ मैं
    यानी अब सुर्ख़ लबों पे मैं सियाही फेंकूँ
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    तन्हा जीते जी मर जाना पड़ता है
    ऐसे ही क्या प्यार निभाना पड़ता है

    जिसके बिना नहीं ये दिल मेरा लगता
    उसके घर तो आना जाना पड़ता है

    मयखाने से पीकर हम घर को निकले
    रस्ते मे भी इक मयखाना पड़ता है

    कह देना कि इश्क़ है आसां काम नहीं
    कहने मे थोड़ा हकलाना पड़ता है

    जब आँखों से राज कोई पढ़ लेता है
    अपने ही सच को झुठलाना पड़ता है
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    बचाता कब तलक मैं एक रिश्ता
    तुम्हें पाता तो घर कैसे बचाता
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    बिछड़कर तुमसे ख़ुद से भी बड़ा रूठा रहा हूँ मैं
    तुम्हारे बाद मुश्किल से बहुत जिंदा रहा हूँ मैं

    निकम्मा कर दिया मुझको तुम्हारी एक हिजरत ने
    वगरना घर का सबसे लाडला लड़का रहा हूँ मैं

    मोहब्बत है, जो नरमी है, तुम्हारे वासते मुझमे
    तुम्हें मै क्या बताऊँ, क्या था और कैसा रहा हूँ मैं

    तुम्हारे हिज़्र मे बीता है हर लम्हा तुम्हारे संग,
    तुम्हारे बिन तुम्हारा बन के इक अरसा रहा हूँ मैं

    मिरे छज्जे से लगकर साथ मे ही था मकाँ उसका
    मगर मिलने को उससे, दूर ही जाता रहा हूँ मैं
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