बिछड़कर तुम सेे ख़ुद से भी बड़ा रूठा रहा हूँ मैं
तुम्हारे बाद मुश्किल से बहुत जिंदा रहा हूँ मैं
निकम्मा कर दिया मुझको तुम्हारी एक हिजरत ने
वगरना घर का सब सेे लाडला लड़का रहा हूँ मैं
मोहब्बत है, जो नरमी है, तुम्हारे वासते मुझ
में
तुम्हें मैं क्या बताऊँ, क्या था और कैसा रहा हूँ मैं
तुम्हारे हिज़्र में बीता है हर लम्हा तुम्हारे संग,
तुम्हारे बिन तुम्हारा बन के इक अरसा रहा हूँ मैं
मिरे छज्जे से लगकर साथ में ही था मकाँ उसका
मगर मिलने को उस सेे, दूर ही जाता रहा हूँ मैं
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