anupam shah

Top 10 of anupam shah

    कुछ तो थी बात मुहब्बत में तेरी शाहजहाँ
    ताज अब कौन बनाता है बिछड़ने पे यहॉं
    anupam shah
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    ख़्वाब इतना भी हसीं मत देखो
    नींद टूटे तो न ये शब गुज़रे
    anupam shah
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    बड़े बूढों के घर को अब जो बच्चे छोड़ देते हैं
    समुंदर साहिलों तक आ के रस्ता मोड़ देते हैं

    वसीयत में कोई भी दस्तख़त जाली नहीं होता
    ये पूरे होश में अपने ही घर को तोड़ देते हैं
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    anupam shah
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    गुनाहों का नहीं है इल्म उस को क़ैदख़ाने में
    यक़ीनन छूट जाएगा तो फिर ये दिल लगाएगा
    anupam shah
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    संग-ए-मरमर की मूरत नहीं आदमी
    इस क़दर ख़ूब-सूरत नहीं आदमी

    चंद क़िस्सों की दरकार है बस इसे
    आदमी की ज़रूरत नहीं आदमी
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    anupam shah
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    या'नी अब उस की मुहब्बत का हलफ़ माँगूँ मैं
    या'नी अब सुर्ख़ लबों पे मैं सियाही फेंकूँ
    anupam shah
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    तन्हा जीते जी मर जाना पड़ता है
    ऐसे ही क्या प्यार निभाना पड़ता है

    जिस के बिना नहीं ये दिल मेरा लगता
    उस के घर तो आना जाना पड़ता है

    मय-ख़ाने से पी कर हम घर को निकले
    रस्ते में भी इक मयखाना पड़ता है

    कह देना कि इश्क़ है आसाँ काम नहीं
    कहने में थोड़ा हकलाना पड़ता है

    जब आँखों से राज कोई पढ़ लेता है
    अपने ही सच को झुठलाना पड़ता है
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    anupam shah
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    बिछड़ कर तुम से ख़ुद से भी बड़ा रूठा रहा हूँ मैं
    तुम्हारे बा'द मुश्किल से बहुत ज़िंदा रहा हूँ मैं

    निकम्मा कर दिया मुझ को तुम्हारी एक हिजरत ने
    वगरना घर का सब से लाडला लड़का रहा हूँ मैं

    मोहब्बत है, जो नरमी है, तुम्हारे वासते मुझ
    में
    तुम्हें मैं क्या बताऊँ, क्या था और कैसा रहा हूँ मैं

    तुम्हारे हिज़्र में बीता है हर लम्हा तुम्हारे संग,
    तुम्हारे बिन तुम्हारा बन के इक अर्सा रहा हूँ मैं

    मिरे छज्जे से लग कर साथ में ही था मकाँ उस का
    मगर मिलने को उस से, दूर ही जाता रहा हूँ मैं
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    anupam shah
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