
बड़े बूढों के घर को अब जो बच्चे छोड़ देते हैं
समुंदर साहिलों तक आ के रस्ता मोड़ देते हैं
वसीयत में कोई भी दस्तख़त जाली नहीं होता
ये पूरे होश में अपने ही घर को तोड़ देते हैं
— anupam shah
Other sher from the same pen
Shers of samundar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling