Mirza Ghalib

Mirza Ghalib

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📍 Delhi· India

Mirza Ghalib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mirza Ghalib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कोई वीरानी सी वीरानी है दश्त को देख के घर याद आया — Mirza Ghalib
बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर 'असद' जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा — Mirza Ghalib
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो — Mirza Ghalib
आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब' किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बा'द — Mirza Ghalib
या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और — Mirza Ghalib
न सताइश की तमन्ना न सिले की परवा गर नहीं हैं मिरे अश'आर में मअ'नी न सही — Mirza Ghalib
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है — Mirza Ghalib
गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार लेकिन तिरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा — Mirza Ghalib
ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ नम-ए-दामान-ए-इस्याँ है तरावत मौज-ए-कौसर की — Mirza Ghalib
फिर उसी बे-वफ़ा पे मरते हैं फिर वही ज़िंदगी हमारी है — Mirza Ghalib
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं — Mirza Ghalib
की मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना — Mirza Ghalib
ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता — Mirza Ghalib
अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँँ तेरा घर मिले — Mirza Ghalib
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का — Mirza Ghalib
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद' सरगश्ता-ए-ख़ुमार-ए-रुसूम-ओ-क़ुयूद था — Mirza Ghalib
धौल-धप्पा उस सरापा नाज़ का शेवा नहीं हम ही कर बैठे थे ‘ग़ालिब’ पेश-दस्ती एक दिन — Mirza Ghalib
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ — Mirza Ghalib
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग-ओ-साज़-हा मस्त-ए-तरब शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है — Mirza Ghalib
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है — Mirza Ghalib

Ghazal

मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किए हुए करता हूँ जम्अ'' फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़्गाँ किए हुए फिर वज़'-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम बरसों हुए हैं चाक गरेबाँ किए हुए फिर गर्म-नाला-हा-ए-शरर-बार है नफ़स मुद्दत हुई है सैर-ए-चराग़ाँ किए हुए फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़ सामान-ए-सद-हज़ार नमक-दाँ किए हुए फिर भर रहा हूँ ख़ामा-ए-मिज़्गाँ ब-ख़ून-ए-दिल साज़-ए-चमन तराज़ी-ए-दामाँ किए हुए बाहम-दिगर हुए हैं दिल ओ दीदा फिर रक़ीब नज़्ज़ारा ओ ख़याल का सामाँ किए हुए दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए है पिंदार का सनम-कदा वीराँ किए हुए फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किए हुए दौड़े है फिर हर एक गुल-ओ-लाला पर ख़याल सद-गुलसिताँ निगाह का सामाँ किए हुए फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना जाँ नज़्र-ए-दिल-फ़रेबी-ए-उनवाँ किए हुए माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किए हुए चाहे है फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू सुर में से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्गाँ किए हुए इक नौ-बहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह चेहरा फ़रोग़-ए-मय से गुलिस्ताँ किए हुए फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें सर ज़ेर-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबाँ किए हुए जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए 'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए — Mirza Ghalib
ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं ग़ैर की बात बिगड़ जाए तो कुछ दूर नहीं वादा-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ है ख़ुशा ताले-ए-शौक़ मुज़्दा-ए-क़त्ल मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं हसरत ऐ ज़ौक़-ए-ख़राबी कि वो ताक़त न रही इश्क़-ए-पुर-अरबदा की गूँ तन-ए-रंजूर नहीं मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें किस र'ऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं ज़ुल्म कर ज़ुल्म अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो तू तग़ाफ़ुल में किसी रंग से मा'ज़ूर नहीं साफ़ दुर्दी-कश-ए-पैमाना-ए-जम हैं हम लोग वाए वो बादा कि अफ़्शुर्दा-ए-अंगूर नहीं हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब' मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं — Mirza Ghalib
यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का याँ जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का बे-मय किसे है ताक़त-ए-आशोब-ए-आगही खींचा है इज्ज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ताज़ा नहीं है नश्शा-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न मुझे तिर्याकी-ए-क़दीम हूँ दूद-ए-चराग़ का सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का बे-ख़ून-ए-दिल है चश्म में मौज-ए-निगह ग़ुबार ये मय-कदा ख़राब है मय के सुराग़ का बाग़-ए-शगुफ़्ता तेरा बिसात-ए-नशात-ए-दिल अब्र-ए-बहार ख़ुम-कद किस के दिमाग़ का? जोश-ए-बहार-ए-कुल्फ़त-ए-नज़्ज़ारा है 'असद' है अब्र पम्बा रौज़न-ए-दीवार-ए-बाग़ का — Mirza Ghalib
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है मिरा सर रंज-ए-बालीं है मिरा तन बार-ए-बिस्तर है सरिश्क-ए-सर ब-सहरा दादा नूर-उल-ऐन-ए-दामन है दिल-ए-बे-दस्त-ओ-पा उफ़्तादा बर-ख़ुरदार-ए-बिस्तर है ख़ुशा इक़बाल-ए-रंजूरी अयादत को तुम आए हो फ़रोग-ए-शम-ए-बालीं फ़रोग-ए-शाम-ए-बालीँ है ब-तूफ़ाँ-गाह-ए-जोश-ए-इज़्तिराब-ए-शाम-ए-तन्हाई शुआ-ए-आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर तार-ए-बिस्तर है अभी आती है बू बालिश से उस की ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं की हमारी दीद को ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा आर-ए-बिस्तर है कहूँ क्या दिल की क्या हालत है हिज्र-ए-यार में ग़ालिब कि बे-ताबी से हर-यक तार-ए-बिस्तर ख़ार-ए-बिस्तर है — Mirza Ghalib
तेरे तौसन को सबा बाँधते हैं हम भी मज़मूँ की हवा बाँधते हैं आह का किस ने असर देखा है हम भी एक अपनी हवा बाँधते हैं तेरी फ़ुर्सत के मुक़ाबिल ऐ उम्र बर्क़ को पा-ब-हिना बाँधते हैं क़ैद-ए-हस्ती से रिहाई मा'लूम अश्क को बे-सर-ओ-पा बाँधते हैं नश्शा-ए-रंग से है वाशुद-ए-गुल मस्त कब बंद-ए-क़बा बाँधते हैं ग़लती-हा-ए-मज़ामीं मत पूछ लोग नाले को रसा बाँधते हैं अहल-ए-तदबीर की वामांदगियाँ आबलों पर भी हिना बाँधते हैं सादा पुरकार हैं ख़ूबाँ 'ग़ालिब' हम से पैमान-ए-वफ़ा बाँधते हैं पाँव में जब वो हिना बाँधते हैं मेरे हाथों को जुदा बाँधते हैं हुस्न-ए-अफ़्सुर्दा-दिल-हा-रंगीं शौक़ को पा-ब-हिना बाँधते हैं क़ैद में भी है असीरी आज़ाद चश्म-ए-ज़ंजीर को वा बाँधते हैं शैख़-जी का'बे का जाना मा'लूम आप मस्जिद में गधा बाँधते हैं किस का दिल ज़ुल्फ़ से भागा कि 'असद' दस्त-ए-शाना ब-क़ज़ा बाँधते हैं तेरे बीमार पे हैं फ़रियादी वो जो काग़ज़ में दवा बाँधते हैं — Mirza Ghalib
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है दिला ये दर्द-ओ-अलम भी तो मुग़्तनिम है कि आख़िर न गिर्या-ए-सहरी है न आह-ए-नीम-शबी है नज़र ब-नक़्स-ए-गदायाँ कमाल-ए-बे-अदबी है कि ख़ार-ए-ख़ुश्क को भी दावा-ए-चमन-नसबी है हुआ विसाल से शौक़-ए-दिल-ए-हरीस ज़ियादा लब-ए-क़दह पे कफ़-ए-बादा जोश-ए-तिश्ना-लबी है ख़ुशा वो दिल कि सरापा तिलिस्म-ए-बे-ख़बरी हो जुनून ओ यास ओ अलम रिज़्क़-ए-मुद्दआ-तलबी है चमन में किस के ये बरहम हुई है बज़्म-ए-तमाशा कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है इमाम-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन अमीर-ए-सूरत-ओ-मअनी 'अली' वली असदुल्लाह जानशीन-ए-नबी है — Mirza Ghalib
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए रखता फिरूँ हूँ ख़िर्क़ा ओ सज्जादा रहन-ए-मय मुद्दत हुई है दावत आब-ओ-हवा किए बे-सर्फ़ा ही गुज़रती है हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किए मक़्दूर हो तो ख़ाक से पूछूँ कि ऐ लईम तू ने वो गंज-हा-ए-गराँ-माया क्या किए किस रोज़ तोहमतें न तराशा किए अदू किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किए सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू देने लगा है बोसा बग़ैर इल्तिजा किए ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं भूले से उस ने सैकड़ों वा'दे वफ़ा किए 'ग़ालिब' तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या माना कि तुम कहा किए और वो सुना किए — Mirza Ghalib
वारस्ता उस से हैं कि मोहब्बत ही क्यूँँ न हो कीजे हमारे साथ अदावत ही क्यूँँ न हो छोड़ा न मुझ में ज़ोफ़ ने रंग इख़्तिलात का है दिल पे बार नक़्श-ए-मोहब्बत ही क्यूँँ न हो है मुझ को तुझ से तज़्किरा-ए-ग़ैर का गिला हर-चंद बर-सबील-ए-शिकायत ही क्यूँँ न हो पैदा हुई है कहते हैं हर दर्द की दवा यूँँ हो तो चारा-ए-ग़म-ए-उल्फ़त ही क्यूँँ न हो डाला न बे-कसी ने किसी से मुआ'मला अपने से खींचता हूँ ख़जालत ही क्यूँँ न हो है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल हम अंजुमन समझते हैं ख़ल्वत ही क्यूँँ न हो हंगामा-ए-ज़बूनी-ए-हिम्मत है इंफ़िआल हासिल न कीजे दहर से इबरत ही क्यूँँ न हो वारस्तगी बहाना-ए-बेगानगी नहीं अपने से कर न ग़ैर से वहशत ही क्यूँँ न हो मिटता है फ़ौत-ए-फ़ुर्सत-ए-हस्ती का ग़म कोई उम्र-ए-अज़ीज़ सर्फ़-ए-इबादत ही क्यूँँ न हो उस फ़ित्ना-ख़ू के दर से अब उठते नहीं 'असद' उस में हमारे सर पे क़यामत ही क्यूँँ न हो — Mirza Ghalib
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना मय वो क्यूँँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते अर्श से उधर होता काश के मकाँ अपना दे वो जिस क़दर ज़िल्लत हम हँसी में टालेंगे बारे आश्ना निकला उन का पासबाँ अपना दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक जाऊँ उन को दिखला दूँ उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूँ-चकाँ अपना घिसते घिसते मिट जाता आप ने अबस बदला नंग-ए-सज्दास मेरे संग-ए-आस्ताँ अपना ता करे न ग़म्माज़ी कर लिया है दुश्मन को दोस्त की शिकायत में हम ने हम-ज़बाँ अपना हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे बे-सबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना — Mirza Ghalib
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते हैं तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं मुआफ़-ए-बे-हूदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़ दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत ज़-बन-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं — Mirza Ghalib
ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक गर्द-ए-राह-ए-यार है सामान-ए-नाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल वर्ना होता है जहाँ में किस क़दर पैदा नमक मुझ को अर्ज़ानी रहे तुझ को मुबारक होजियो नाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़ंदा-ए-गुल का नमक शोर-ए-जौलाँ था कनार-ए-बहर पर किस का कि आज गर्द-ए-साहिल है ब-ज़ख़्म-ए-मौज-ए-दरिया नमक दाद देता है मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर की वाह वाह याद करता है मुझे देखे है वो जिस जा नमक छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक़ हैफ़ है दिल तलब करता है ज़ख़्म और माँगे हैं आ'ज़ा नमक ग़ैर की मिन्नत न खींचूँगा पय-ए-तौफ़ीर-ए-दर्द ज़ख़्म मिस्ल-ए-ख़ंदा-ए-क़ातिल है सर-ता-पा नमक याद हैं 'ग़ालिब' तुझे वो दिन कि वज्द-ए-ज़ौक़ में ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक इस अमल में ऐश की लज़्ज़त नहीं मिलती 'असद' ज़ोर निस्बत मय से रखता है अज़ारा का नमक — Mirza Ghalib
वुसअत-ए-सई-ए-करम देख कि सर-ता-सर-ए-ख़ाक गुज़रे है आबला-पा अब्र-ए-गुहर-बार हुनूज़ यक-क़लम काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा है सफ़्हा-ए-दश्त नक़्श-ए-पा में है तब-ए-गर्मी-ए-रफ़्तार हुनूज़ दाग़-ए-अतफ़ाल है दीवाना ब-कोहसार हुनूज़ ख़ल्वत-ए-संग में है नाला तलब-गार हुनूज़ ख़ाना है सैल से ख़ू-कर्दा-ए-दीदार हुनूज़ दूरबीं दर-ज़दा है रख़्ना-ए-दीवार हुनूज़ आई यक-उम्र से मअज़ूर-ए-तमाशा नर्गिस चश्म-ए-शबनम में न टूटा मिज़ा-ए-ख़ार हुनूज़ क्यूँँ हुआ था तरफ़-ए-आबला-ए-पा या-रब जादा है वा-शुदन-ए-पेचिश-ए-तूमार हुनूज़ हों ख़मोशी-ए-चमन हसरत-ए-दीदार 'असद' मिज़ा है शाना-कश-ए-तुर्रा-ए-गुफ़्तार हुनूज़ — Mirza Ghalib
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले हूरान-ए-ख़ुल्द में तिरी सूरत मगर मिले अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँँ तेरा घर मिले साक़ी-गरी की शर्म करो आज वर्ना हम हर शब पिया ही करते हैं मय जिस क़दर मिले तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम मेरा सलाम कहियो अगर नामा-बर मिले तुम को भी हम दिखाएँ कि मजनूँ ने क्या किया फ़ुर्सत कशाकश-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ से गर मिले लाज़िम नहीं कि ख़िज़्र की हम पैरवी करें जाना कि इक बुज़ुर्ग हमें हम-सफ़र मिले ऐ साकिनान-ए-कूचा-ए-दिलदार देखना तुम को कहीं जो 'ग़ालिब'-ए-आशुफ़्ता-सर मिले — Mirza Ghalib
तू दोस्त कसू का भी सितमगर न हुआ था औरों पे है वो ज़ुल्म कि मुझ पर न हुआ था छोड़ा मह-ए-नख़शब की तरह दस्त-ए-क़ज़ा ने ख़ुर्शीद हुनूज़ उस के बराबर न हुआ था तौफ़ीक़ ब-अंदाज़ा-ए-हिम्मत है अज़ल से आँखों में है वो क़तरा कि गौहर न हुआ था जब तक कि न देखा था क़द-ए-यार का आलम मैं मो'तक़िद-ए-फ़ित्ना-ए-महशर न हुआ था मैं सादा-दिल आज़ुर्दगी-ए-यार से ख़ुश हूँ या'नी सबक़-ए-शौक़ मुकर्रर न हुआ था दरिया-ए-मआसी तुनुक-आबी से हुआ ख़ुश्क मेरा सर-ए-दामन भी अभी तर न हुआ था जारी थी 'असद' दाग़-ए-जिगर से मिरी तहसील आतिश-कदा जागीर-ए-समुंदर न हुआ था — Mirza Ghalib
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो बचते नहीं मुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्र से क़ातिल अगर रक़ीब है तो तुम गवाह हो क्या वो भी बे-गुनह-कुश ओ हक़-ना-शनास हैं माना कि तुम बशर नहीं ख़ुर्शीद ओ माह हो उभरा हुआ नक़ाब में है उन के एक तार मरता हूँ मैं कि ये न किसी की निगाह हो जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद मस्जिद हो मदरसा हो कोई ख़ानक़ाह हो सुनते हैं जो बहिश्त की ता'रीफ़ सब दुरुस्त लेकिन ख़ुदा करे वो तिरा जल्वा-गाह हो 'ग़ालिब' भी गर न हो तो कुछ ऐसा ज़रर नहीं दुनिया हो या रब और मिरा बादशाह हो — Mirza Ghalib
वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को सद-रह आहंग-ए-ज़मीं बोस-ए-क़दम है हम को दिल को मैं और मुझे दिल महव-ए-वफ़ा रखता है किस क़दर ज़ौक़-ए-गिरफ़्तारी-ए-हम है हम को ज़ोफ़ से नक़्श-ए-प-ए-मोर है तौक़-ए-गर्दन तिरे कूचे से कहाँ ताक़त-ए-रम है हम को जान कर कीजे तग़ाफ़ुल कि कुछ उम्मीद भी हो ये निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ तो सम है हम को रश्क-ए-हम-तरही ओ दर्द-ए-असर-ए-बांग-ए-हज़ीं नाला-ए-मुर्ग़-ए-सहर तेग़-ए-दो-दम है हम को सर उड़ाने के जो वादे को मुकर्रर चाहा हँस के बोले कि तिरे सर की क़सम है हम को दिल के ख़ूँ करने की क्या वजह व-लेकिन नाचार पास-ए-बे-रौनक़ी-ए-दीदा अहम है हम को तुम वो नाज़ुक कि ख़मोशी को फ़ुग़ाँ कहते हो हम वो आजिज़ कि तग़ाफ़ुल भी सितम है हम को लखनऊ आने का बाइस नहीं खुलता या'नी हवस-ए-सैर-ओ-तमाशा सो वो कम है हम को मक़्ता-ए-सिलसिला-ए-शौक़ नहीं है ये शहर अज़्म-ए-सैर-ए-नजफ़-ओ-तौफ़-ए-हरम है हम को लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो 'ग़ालिब' जादा-ए-रह कशिश-ए-काफ़-ए-करम है हम को अब्र रोता है कि बज़्म-ए-तरब आमादा करो बर्क़ हँसती है कि फ़ुर्सत कोई दम है हम को — Mirza Ghalib